भारत की तटीय जैव विविधता की चर्चा करते समय अक्सर प्रवाल भित्तियों और मैंग्रोव का उल्लेख होता है, लेकिन समुद्र के भीतर फैली समुद्री घास के मैदान (Seagrass Meadows) एक उतनी ही महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र है. इन्हें बहुत कम लोग जानते हैं. ये पानी के भीतर फूल देने वाले पौधे हैं, जो समुद्र की तलहटी पर घने मैदान की तरह फैले रहते हैं.
क्या है समुद्री घास के मैदान
समुद्री घास के मैदान समुद्री पानी को साफ करने,तलछट को स्थिर रखने और कार्बन को अवशोषित करने में मदद करती हैं. इन्हें अक्सर ‘ब्लू कार्बन सिंक’ कहा जाता है, क्योंकि ये वायुमंडल से बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड सोखकर जलवायु परिवर्तन को कम करने में योगदान देती हैं. इसके अलावा, घास के ये मैदान समुद्री जीवों की नर्सरी भी हैं. अनेक मछलियां, केकड़े, झींगे अपना जीवन चक्र यहां से शुरू करते हैं. संकटग्रस्त प्रजातियां जैसे डुगोंग (समुद्री गाय) और समुद्री कछुए भी इन्हीं मैदानों पर भोजन और आश्रय के लिए निर्भर रहते हैं. तमिलनाडु के मन्नार की खाड़ी (Gulf of Mannar) में डुगोंग की उपस्थिति समुद्री घास की पारिस्थितिकी से सीधे तौर पर जुड़ी है.
स्थानीय मछुआरे भी घास के मैदानों को महत्वपूर्ण मानते हैं. हाल के सालों में सामुदायिक निगरानी और वैज्ञानिक सर्वेक्षणों से यह पता चला है कि ये तटीय आजीविका और खाद्य सुरक्षा की नींव हैं. स्वस्थ समुद्री घास मछलियों की प्रजनन क्षमता बढ़ाती है. इससे तटीय समुदायों की आय और जीवनयापन सुरक्षित रहता है. जहां प्रवाल भित्तियां पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करती हैं, वहीं समुद्री घास का यह पारिस्थितिकी तंत्र बिना किसी शोर के लगातार हमारी सेवा करता रहता है. यह तटीय क्षरण को रोकता है, समुद्र के पानी को स्वच्छ रखता है और हमें भोजन, आजीविका और जलवायु स्थिरता प्रदान करता है.
आज आवश्यकता है कि हम इस छुपे हुए पारिस्थितिकी तंत्र को और अधिक पहचान दें. स्कूलों में शिक्षा, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और वैज्ञानिक शोध मिलकर समुद्री घास की घासभूमियों की रक्षा कर सकते हैं. यदि इन्हें संरक्षित किया गया, तो यह न केवल डुगोंग और कछुओं जैसे दुर्लभ जीवों को बचाएंगी बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी स्वच्छ जल और स्थायी जीवन सुनिश्चित करेंगी.