हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ गीत ऐसे हैं जो सिर्फ गाने नहीं, बल्कि जिंदगी का दर्शन बन जाते हैं। ऐसा ही एक गीत है “जीना यहां मरना यहां”, जिसे सुनते ही आज भी लाखों लोगों की आंखें नम हो जाती हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस गीत के पीछे एक कलाकार का निजी दर्द, टूटा हुआ सपना और जिंदगी का सबसे कठिन दौर छिपा हुआ था।
Shailendra हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के उन चुनिंदा गीतकारों में शामिल थे, जिन्होंने साधारण शब्दों में असाधारण भावनाओं को व्यक्त किया। “आवारा हूं”, “मेरा जूता है जापानी” और “दिल का हाल सुने दिलवाला” जैसे कालजयी गीत लिखने वाले शैलेंद्र का जीवन भी संघर्षों से भरा रहा।
साल 1966 में शैलेंद्र ने अपने सपनों की फिल्म Teesri Kasam का निर्माण किया। उन्हें इस फिल्म से बेहद उम्मीदें थीं, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर फिल्म बुरी तरह असफल रही। राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के बावजूद आर्थिक नुकसान इतना बड़ा था कि शैलेंद्र कर्ज और मानसिक तनाव में डूब गए।
इसी दौर में उनके करीबी मित्र और शोमैन Raj Kapoor अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म Mera Naam Joker पर काम कर रहे थे। उन्हें एक ऐसे गीत की जरूरत थी जो फिल्म की आत्मा बन सके। जब शैलेंद्र उनसे मिलने पहुंचे, तो उनके चेहरे पर जिंदगी की थकान और दर्द साफ दिखाई दे रहा था।
राज कपूर ने सिर्फ इतना कहा कि गीत एक ऐसे जोकर की कहानी कहे, जो अपने भीतर के दुख को छिपाकर दुनिया को हंसाता रहता है। बस यही एक विचार शैलेंद्र के भीतर छिपे दर्द को शब्दों में बदलने के लिए काफी था।
कहा जाता है कि शैलेंद्र ने इस गीत में अपनी जिंदगी की पीड़ा, संघर्ष और असफलताओं को उकेर दिया। परिणाम था—“जीना यहां, मरना यहां, इसके सिवा जाना कहां…”। यह सिर्फ फिल्म का गीत नहीं रहा, बल्कि कलाकारों, सपने देखने वालों और जिंदगी से जूझ रहे लोगों का भावनात्मक घोषणापत्र बन गया।
दुर्भाग्य से फिल्म की रिलीज से पहले ही शैलेंद्र इस दुनिया को अलविदा कह गए। लेकिन उनके लिखे शब्द आज भी करोड़ों लोगों के दिलों में जिंदा हैं। यही वजह है कि “जीना यहां मरना यहां” को हिंदी सिनेमा के सबसे भावुक और अमर गीतों में गिना जाता है।