जहां खारे पानी और रेतीली जमीन पर खेती करना मुश्किल माना जाता है, वहीं राजस्थान के नागौर जिले के सीलवा गांव के किसान भोजराज सारस्वत ने अपनी मेहनत और जैविक खेती के दम पर इस सोच को बदलकर रख दिया है। जिस जमीन पर कभी सिर्फ खेजड़ी के पेड़ दिखाई देते थे, आज वहीं 30 से अधिक प्रजातियों के फलदार, औषधीय और छायादार पेड़ लहलहा रहे हैं।
एक खजूर के पौधे से शुरू हुआ सफर
भोजराज सारस्वत ने वर्ष 2016 में सिर्फ एक खजूर के पौधे से अपनी बागवानी की शुरुआत की थी। शुरुआती पांच साल उनके लिए बेहद चुनौतीपूर्ण रहे। खारे पानी, रेगिस्तानी जलवायु और कठिन मौसम के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और जैविक खेती के जरिए पौधों की देखभाल करते रहे। उनकी मेहनत रंग लाई और आज उनका खेत एक हरे-भरे बगीचे में बदल चुका है।
100 क्विंटल खजूर का उत्पादन, सालाना 6 लाख की आय
वर्तमान में उनके बगीचे में करीब 100 खजूर के पेड़ हैं, जिनसे हर साल लगभग 100 क्विंटल खजूर का उत्पादन होता है। केवल खजूर की खेती से ही उन्हें करीब 6 लाख रुपये की वार्षिक आय हो रही है।
30 से ज्यादा प्रजातियों के पेड़-पौधे
खजूर के अलावा उनके बगीचे में सेब, अनार, बेर, अमरूद, बेल, आंवला, शहतूत, चीकू, किन्नू, मौसमी, सहजन, काला जामुन, अशोक, पीपल, शीशम, नीम सहित 30 से अधिक प्रकार के फलदार और औषधीय पेड़-पौधे लगाए गए हैं। इनसे भी उन्हें हर वर्ष अच्छी आमदनी प्राप्त हो रही है।
रासायनिक नहीं, जैविक खेती पर भरोसा
भोजराज सारस्वत का कहना है कि उन्होंने अपने बगीचे में आज तक किसी भी रासायनिक कीटनाशक का उपयोग नहीं किया। पौधों को कीटों से बचाने और पोषण देने के लिए वे नीम की पत्तियां, गुड़, छाछ, गोमूत्र और गोबर से तैयार जैविक घोल का इस्तेमाल करते हैं। इससे पौधे स्वस्थ रहते हैं और मिट्टी की गुणवत्ता भी बनी रहती है।
पौधों से भी हो रही अतिरिक्त कमाई
सिंचाई के लिए उन्होंने खेत में तीन फार्म पॉन्ड बनाए हैं। इसके अलावा खजूर की बरही किस्म के पौधों से हर साल 30 से 35 नए पौधे तैयार होते हैं, जिन्हें वे लगभग 1,500 रुपये प्रति पौधा बेचते हैं। इससे उन्हें अतिरिक्त आय भी होती है।
किसानों के लिए बनी मिसाल
भोजराज सारस्वत की सफलता इस बात का प्रमाण है कि सही तकनीक, धैर्य और मेहनत के साथ रेगिस्तानी और खारे पानी वाली जमीन पर भी लाभदायक खेती की जा सकती है। उनका बगीचा आज पूरे क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणा का केंद्र बन चुका है और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने का बेहतरीन उदाहरण भी है।