AI के लिए चीन ने बदली पूरी शिक्षा व्यवस्था, 12,200 कोर्स बंद; क्या भारत को भी बदलनी होंगी अपनी डिग्रियां?

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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की दौड़ में चीन ने एक ऐसा कदम उठाया है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। पिछले पांच वर्षों में चीन ने अपनी उच्च शिक्षा व्यवस्था में बड़े पैमाने पर बदलाव करते हुए 12,200 अंडरग्रेजुएट कोर्स बंद कर दिए और उनकी जगह 10,200 नए कोर्स शुरू किए हैं। यह बदलाव चीन के कुल विश्वविद्यालय पाठ्यक्रमों के 30 प्रतिशत से अधिक हिस्से को प्रभावित करता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन कोर्सों को हटाया गया है, वे मुख्य रूप से आर्ट्स, ह्यूमैनिटीज, विदेशी भाषाओं और पारंपरिक मैनेजमेंट विषयों से जुड़े थे। उनकी जगह AI, रोबोटिक्स, एडवांस्ड कंप्यूटिंग, मशीन लर्निंग और क्वांटम टेक्नोलॉजी जैसे भविष्य-केंद्रित विषयों को शामिल किया गया है।

AI के युग के लिए तैयार हो रहा चीन

चीन की प्रमुख यूनिवर्सिटीज अब “Embodied Intelligence” जैसे नए विषयों में डिग्री दे रही हैं। यह क्षेत्र AI को वास्तविक दुनिया की मशीनों और रोबोट्स से जोड़ने का काम करता है। इतना ही नहीं, चीन ने स्कूल स्तर पर भी बदलाव शुरू कर दिए हैं। वहां छोटे बच्चों को शुरुआती कक्षाओं से ही एल्गोरिदम, कोडिंग और कम्प्यूटेशनल थिंकिंग की शिक्षा दी जा रही है।

चीन का मानना है कि भविष्य की अर्थव्यवस्था में वही देश आगे रहेगा जिसके पास AI और नई तकनीकों में प्रशिक्षित मानव संसाधन होगा।

भारत के लिए चेतावनी की घंटी

भारत के लिए यह सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय खबर नहीं बल्कि एक महत्वपूर्ण संकेत है। AI, ऑटोमेशन और रोबोटिक्स तेजी से नौकरियों की प्रकृति बदल रहे हैं। कई पारंपरिक नौकरियां समाप्त हो सकती हैं जबकि नई तकनीकी नौकरियों की मांग तेजी से बढ़ेगी।

भारत के आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 ने भी माना है कि AI का सबसे अधिक असर मध्यम और निम्न आय वर्ग की नौकरियों पर पड़ेगा। यही वह वर्ग है जिसके लिए भारतीय विश्वविद्यालय हर साल लाखों स्नातक तैयार करते हैं।

बेरोजगारी नहीं, ‘स्किल गैप’ है सबसे बड़ा खतरा

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के सामने केवल रोजगार की चुनौती नहीं है, बल्कि उससे भी बड़ी चुनौती है “स्किल गैप”। करोड़ों छात्र जिन विषयों की पढ़ाई कर रहे हैं, उनकी बाजार में मांग तेजी से कम हो रही है, जबकि नई तकनीकी क्षमताओं की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है।

विश्व आर्थिक मंच (WEF) के अनुसार वर्ष 2030 तक भारत के लगभग 63% कार्यबल को AI और ऑटोमेशन के अनुरूप नई स्किल्स सीखनी पड़ेंगी।

भारत के पास अवसर भी है

भारत पहले भी शिक्षा और कौशल के दम पर वैश्विक अवसरों का लाभ उठा चुका है। 1990 के दशक की आईटी क्रांति में भारतीय इंजीनियरों और अंग्रेजी भाषी पेशेवरों ने देश को नई पहचान दिलाई। इसी तरह फार्मास्यूटिकल क्षेत्र में भी भारत वैश्विक शक्ति बनकर उभरा।

आज AI एक नई तकनीकी क्रांति के रूप में सामने है। भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) कम्प्यूटेशनल थिंकिंग, तकनीकी शिक्षा और बहुविषयक अध्ययन पर जोर देती है। सरकार वर्ष 2027 से स्कूल स्तर पर AI पाठ्यक्रम लागू करने की दिशा में भी काम कर रही है।

चुनौतियां अभी भी बड़ी हैं

हालांकि नीति बनाना और उसे जमीन पर उतारना दो अलग बातें हैं। देश के कई हिस्सों में अभी भी बुनियादी शिक्षा और साक्षरता की चुनौतियां मौजूद हैं। ऐसे में AI और कोडिंग जैसी उन्नत तकनीकी शिक्षा को व्यापक स्तर पर लागू करना आसान नहीं होगा।

साथ ही निजी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों पर भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या वे वास्तव में अपने पाठ्यक्रमों को भविष्य की जरूरतों के अनुसार बदल रहे हैं या केवल पुराने कोर्सों को नए नामों के साथ पेश कर रहे हैं।

क्या भारत को भी शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव करना चाहिए?

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को चीन की नकल करने की जरूरत नहीं है, लेकिन शिक्षा, रिसर्च और स्किल डेवलपमेंट को भविष्य की अर्थव्यवस्था के अनुरूप ढालना अनिवार्य हो गया है। उद्योग, विश्वविद्यालय, रिसर्च संस्थान और सरकार को मिलकर ऐसा ढांचा तैयार करना होगा जो AI युग की जरूरतों के अनुरूप युवाओं को तैयार कर सके।

AI की इस नई दुनिया में भारत इनोवेशन का नेतृत्व करेगा या केवल सस्ती श्रमशक्ति बनकर रह जाएगा, इसका फैसला आज लिए जाने वाले शिक्षा और कौशल विकास से जुड़े निर्णय ही करेंगे।

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