देश की सबसे पुरानी आयुर्वेदिक कंपनियों में शामिल डाबर (Dabur) एक बार फिर चर्चा में है। खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) द्वारा कंपनी को कुछ उत्पादों पर “100% शुद्ध” और “100% नेचुरल” जैसे दावों से बचने की सलाह दिए जाने के बाद लोगों की नजरें इस 140 साल पुराने ब्रांड पर टिक गई हैं। लेकिन डाबर की शुरुआत किसी बड़ी फैक्ट्री या उद्योग से नहीं, बल्कि एक आयुर्वेदिक डॉक्टर की साइकिल और सेवा भावना से हुई थी।
डाबर की कहानी वर्ष 1884 के आसपास शुरू होती है, जब देश अंग्रेजी शासन के दौर से गुजर रहा था। उस समय हैजा, मलेरिया और अन्य संक्रामक बीमारियों के कारण हजारों लोगों की जान जा रही थी। अस्पतालों और दवाइयों की भारी कमी थी। ऐसे समय में कोलकाता के आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. एस.के. बर्मन ने जड़ी-बूटियों पर शोध कर कम कीमत की आयुर्वेदिक दवाएं तैयार कीं और साइकिल से गांव-गांव जाकर लोगों तक पहुंचाईं।
डॉ. बर्मन की दवाओं ने ग्रामीणों का भरोसा जीता और धीरे-धीरे उनका नाम दूर-दूर तक फैलने लगा। बंगाल में लोग उन्हें प्यार से ‘डाकतार’ (Daktar) कहते थे। इसी ‘डाकतार’ और उनके उपनाम ‘बर्मन’ (Burman) को मिलाकर ‘डाबर’ (Dabur) नाम रखा गया, जो आगे चलकर देश का एक बड़ा आयुर्वेदिक ब्रांड बन गया।
डाबर के विस्तार की असली शुरुआत 1919 में हुई, जब डॉ. बर्मन के बेटे सी.एल. बर्मन ने उत्पादन बढ़ाने के लिए फैक्ट्री और आधुनिक प्रयोगशाला की स्थापना की। आयुर्वेदिक फार्मूलों की गुणवत्ता बनाए रखते हुए मशीनों के जरिए उत्पादन शुरू किया गया। इसके बाद कंपनी ने सिर्फ दवाओं तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि हेयर केयर, हेल्थकेयर और पर्सनल केयर उत्पादों में भी कदम रखा। 1940 के दशक में लॉन्च हुआ डाबर आंवला हेयर ऑयल कंपनी के सबसे लोकप्रिय उत्पादों में शामिल हो गया।
बाद के वर्षों में पश्चिम बंगाल में राजनीतिक अस्थिरता, मजदूर आंदोलनों और औद्योगिक चुनौतियों के चलते डाबर ने अपना मुख्यालय 1972 में कोलकाता से नई दिल्ली स्थानांतरित कर दिया। दिल्ली आने के बाद कंपनी को उत्तर भारत के बड़े बाजारों तक पहुंच मिली और कारोबार तेजी से बढ़ा।
आज डाबर भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों में अपने आयुर्वेदिक और उपभोक्ता उत्पादों के लिए जानी जाती है। एक आयुर्वेदिक डॉक्टर की साइकिल से शुरू हुआ यह सफर आज हजारों करोड़ रुपये के कारोबार वाली कंपनी की सफलता की मिसाल बन चुका है।