Bihar Chunav Raghopur Assembly Seat : बिहार की राजनीति में राघोपुर सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि लालू परिवार की सियासी पहचान रहा है. लेकिन, इस बार यह पहचान चुनौती के घेरे में है. गंगा की धार से घिरा यह इलाका जितना भौगोलिक रूप से सीमित है उतना ही सियासी रूप से खुला मैदान बन चुका है जहां तेजस्वी यादव को तीनतरफा चुनौती का सामना करना पड़ रहा है.
राघोपुर को लंबे समय तक ‘लालू परिवार का गढ़’ कहा जाता रहा है. 1995 से लेकर 2020 तक लालू यादव, राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव ने यहां से चुनाव जीता है. मगर इस बार समीकरण पुराने नहीं हैं. बीजेपी-जेडीयू गठबंधन ने पिछली बार के मुकाबले अपना संगठन बूथ स्तर तक मजबूत किया है. कहा तो जा रहा है कि तेजस्वी यादव बनाम सतीश कुमार के बीच जातीय समर्थन और बंटवारा निर्णायक होगा. वहीं, जन सुराज का उम्मीदवार वोट विभाजन का कारण बन सकता है जो तेजस्वी यादव के लिए टेंशन की वजह हो सकती है. ऐसे में कहा जा रहा है कि राघोपुर विधानसभा सीट पर इस बार भी लड़ाई बेहद दिलचस्प होने वाली है.
खास बात यह है कि राघोपुर में तीन यादव और एक राजपूत उम्मीदवार के बीच मुख्य मुकाबला है. 30 प्रतिशत यादव मतदाताओं के बाद सबसे ज्यादा वोटर राजपूत हैं. दूसरी ओर सियासी तौर पर राघोपुर के रण में तेजस्वी यादव की तगड़ी घेराबंदी की गई है. आरजेडी नेता तेजस्वी प्रसाद यादव यहां से तीसरी बार चुनाव लड़ रहे हैं और चुनाव में मुख्य टक्कर महागठबंधन (आरजेडी) बनाम एनडीए (बीजेपी) के बीच है, लेकिन प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार के कारण समीकरण जटिल हो गए हैं. जबकि एक कोण तेज प्रताप यादव का भी है जिनके जनशक्ति जनता दल के प्रत्याशी भी चुनावी मैदान में हैं.
गंगा की गोद में सियासी धार, घिरा हुआ मैदान!
भौगोलिक दृष्टि से राघोपुर चारों तरफ से गंगा और उसकी सहायक नदियों से घिरा है, जिससे यह क्षेत्र प्राकृतिक रूप से लगभग एक ‘द्वीप’ बन जाता है. अब यही तस्वीर राजनीतिक अर्थ में भी देखने को मिल रही है. दरअसल, इस बार बिहार चुनाव में तेजस्वी यादव का किला तीन ओर से विरोधी लहरों से घिरा हुआ है. एक ओर एनडीए का यादव–कुर्मी वोट जोड़ने का प्रयास है तो दूसरी ओर अल्पसंख्यक वोट में एआईएमआईएम की दावेदारी. वहीं, तीसरी ओर जनसुराज पार्टी जैसी नई ताकतें पारंपरिक वोट बैंक को तोड़ने में लगी हैं.