IIT बॉम्बे ने ब्लड मार्करों के ज़रिए डायबिटीज़ पहचान में नई दिशा दिखाई

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भारत में मधुमेह लगातार एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है। देश में वर्तमान में लगभग 10.1 करोड़ वयस्क डायबिटीज़ से पीड़ित हैं, जबकि 13.6 करोड़ लोग प्रीडायबिटीज़ के जोखिम में हैं। अब, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) बॉम्बे के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी खोज की है, जो इस बीमारी की शुरुआती और अधिक सटीक पहचान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है। शोधकर्ताओं ने रक्त में मौजूद छोटे रासायनिक अणुओं (मेटाबोलाइट्स) का विश्लेषण करके ऐसे संकेतक खोजे हैं, जो दिखाते हैं कि शरीर में मधुमेह किस चरण में बढ़ रहा है — अक्सर उस समय जब पारंपरिक रक्त शर्करा परीक्षण कोई चेतावनी नहीं देते।

वर्तमान में मधुमेह की पहचान के लिए HbA1c और फास्टिंग ब्लड शुगर जैसे परीक्षण इस्तेमाल होते हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह परीक्षण रोग के पीछे छिपी बायोकेमिकल गतिविधि की पूरी तस्वीर नहीं दिखाते, और यह पता नहीं चल पाता कि किस व्यक्ति को आगे चलकर गंभीर जटिलताओं का जोखिम है।

इसी को ध्यान में रखते हुए IIT बॉम्बे की टीम ने मेटाबोलोमिक्स तकनीक का उपयोग किया — यह वह तकनीक है जिसमें रक्त में मौजूद छोटे अणुओं का विश्लेषण करके शरीर में हो रहे चयापचय परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है।

टीम ने जून 2021 से जुलाई 2022 के बीच हैदराबाद के उस्मानिया जनरल अस्पताल में 52 प्रतिभागियों से रक्त नमूने लिए। इनमें 15 स्वस्थ लोग, 23 टाइप-2 डायबिटीज़ रोगी और 14 ऐसे रोगी शामिल थे जिन्हें मधुमेह के कारण गुर्दे की बीमारी (DKD) हो चुकी थी।

शोधकर्ताओं ने LC-MS और GC-MS जैसी उन्नत तकनीकों की मदद से लगभग 300 मेटाबोलाइट्स का अध्ययन किया।
परिणामों में 26 ऐसे मेटाबोलाइट्स पाए गए जो स्वस्थ व्यक्तियों और मधुमेह रोगियों में स्पष्ट रूप से अलग थे। इनमें कुछ पहले से ज्ञात थे — जैसे:

  • ग्लूकोज़

  • कोलेस्ट्रॉल

  • 1,5-एनहाइड्रोग्लुसिटोल

लेकिन कुछ नए मेटाबोलाइट्स भी पहचाने गए, जैसे:

  • वैलेरोबेटाइन

  • राइबोथाइमिडीन

  • फ्रुक्टोसिल-पाइरोग्लूटामेट

ये पहले डायबिटीज़ से जुड़े नहीं माने जाते थे। इससे यह साफ होता है कि मधुमेह सिर्फ़ ब्लड शुगर की समस्या नहीं, बल्कि यह संपूर्ण मेटाबोलिक सिस्टम को प्रभावित करने वाला विकार है।

इसके अलावा, टीम ने पाया कि कुछ मेटाबोलाइट्स ऐसे भी हैं जो यह दिखा सकते हैं कि मधुमेह रोगी में आगे चलकर गुर्दे की समस्या उत्पन्न होने की संभावना कितनी है। गुर्दे की बीमारी वाले समूह में:

  • एराबिटोल

  • मायो-इनोसिटोल

  • राइबोथाइमिडीन

  • और 2PY (गुर्दे के क्षतिग्रस्त होने पर जमा होने वाला यौगिक)

लगातार बढ़े हुए पाए गए।

शोधकर्ताओं का कहना है कि भविष्य में यह अध्ययन पर्सनलाइज्ड उपचार, रोग की शुरुआती पहचान और जटिलताओं की रोकथाम में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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