नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्नातक डिग्री विवाद से जुड़े मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार (12 नवंबर, 2025) को दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) को अपील दायर करने में हुई देरी के लिए माफी मांगने वाली याचिकाओं पर अपना जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने विश्वविद्यालय को तीन सप्ताह का समय दिया है, जबकि अपीलकर्ताओं को आपत्तियों के जवाब के लिए दो सप्ताह का समय मिलेगा।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की खंडपीठ ने कहा कि अगली सुनवाई 16 जनवरी, 2026 को की जाएगी। अदालत में भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता दिल्ली विश्वविद्यालय की ओर से पेश हुए।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला उस समय शुरू हुआ जब केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने 2016 में एक आदेश पारित कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बीए डिग्री से संबंधित जानकारी का खुलासा करने का निर्देश दिया था। CIC ने दिल्ली विश्वविद्यालय को अनुमति दी थी कि 1978 में बीए परीक्षा पास करने वाले छात्रों के अभिलेखों का निरीक्षण किया जा सके — वही वर्ष जब प्रधानमंत्री मोदी ने भी यह परीक्षा उत्तीर्ण की थी।
इस आदेश को दिल्ली विश्वविद्यालय और अन्य पक्षों ने अदालत में चुनौती दी थी। 25 अगस्त, 2025 को दिल्ली हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने CIC के आदेश को खारिज करते हुए कहा था कि सिर्फ इसलिए कि प्रधानमंत्री सार्वजनिक पद पर हैं, उनकी व्यक्तिगत जानकारी स्वतः सार्वजनिक नहीं की जा सकती। अदालत ने माना था कि मांगी गई जानकारी में कोई अंतर्निहित जनहित (public interest) नहीं है और यह मामला RTI कानून की मूल भावना — पारदर्शिता — से भटकता हुआ प्रतीत होता है।
खंडपीठ में सुनवाई
चार अपीलें दायर की गई हैं — जिनमें सूचना कार्यकर्ता नीरज, आम आदमी पार्टी नेता संजय सिंह, और अधिवक्ता मोहम्मद इरशाद की याचिकाएं शामिल हैं। ये सभी अपीलें एकल न्यायाधीश के आदेश को चुनौती देती हैं, जिसमें प्रधानमंत्री की डिग्री संबंधी सूचना के खुलासे के खिलाफ फैसला दिया गया था।
पीठ के समक्ष यह दलील दी गई कि अपील दाखिल करने में तकनीकी कारणों से देरी हुई थी, जिसके लिए अदालत से माफी मांगी जा रही है। अदालत ने कहा कि विश्वविद्यालय अपनी आपत्तियां तीन सप्ताह के भीतर दाखिल करे और यदि कोई जवाब दायर किया जाता है, तो अपीलकर्ता दो सप्ताह के भीतर रिप्लाई दाखिल कर सकते हैं।
एकल न्यायाधीश का आदेश क्या कहता था
25 अगस्त को दिए गए आदेश में न्यायाधीश ने कहा था कि —
“सिर्फ इसलिए कि प्रधानमंत्री या कोई अन्य व्यक्ति सार्वजनिक पद पर है, इसका अर्थ यह नहीं कि उसकी सारी निजी जानकारी जनसामान्य के लिए खुली हो जाए।”
न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि आरटीआई अधिनियम का उद्देश्य सरकारी कार्यों में पारदर्शिता लाना है, व्यक्तिगत जानकारी को सनसनीखेज बनाने का नहीं।
एकल न्यायाधीश ने यह भी कहा था कि प्रधानमंत्री पद के लिए शैक्षिक योग्यता कोई वैधानिक शर्त नहीं है, इसलिए इस जानकारी के प्रकटीकरण में कोई सार्वजनिक हित नहीं बनता।
दिल्ली विश्वविद्यालय के वकील ने अदालत से कहा था कि विश्वविद्यालय को अपने रिकॉर्ड दिखाने में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन वे CIC के उस आदेश से असहमत हैं जिसमें जानकारी को सार्वजनिक करने का निर्देश दिया गया था।
अन्य संबंधित मामला
एकल न्यायाधीश ने उसी आदेश में पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की शैक्षणिक योग्यता से जुड़े CIC के आदेश को भी रद्द कर दिया था। उस आदेश में CBSE को उनकी कक्षा 10 और 12 की मार्कशीट्स की प्रतियां देने का निर्देश दिया गया था।
अब जबकि दिल्ली उच्च न्यायालय ने डीयू को अपनी प्रतिक्रिया दाखिल करने के लिए समय दिया है, अगली सुनवाई में यह तय हो सकता है कि अपीलों को औपचारिक रूप से सुनवाई के लिए स्वीकार किया जाएगा या नहीं। फिलहाल, अदालत ने किसी भी प्रकार की अंतरिम राहत देने से इनकार करते हुए मामला 16 जनवरी, 2026 के लिए सूचीबद्ध किया है।