अमेरिका का पूर्वी प्रशांत में ड्रग तस्करी नाव पर हमला: तीन की मौत, सितंबर से अब तक 21वां मामला, 83 से अधिक मारे गए

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अमेरिकी सेना ने शनिवार (15 नवंबर) को अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में पूर्वी प्रशांत महासागर में एक संदिग्ध मादक पदार्थ तस्करी नाव पर घातक हमला किया, जिसमें नाव पर सवार तीन लोग मारे गए। यह हमला ट्रंप प्रशासन की आक्रामक ‘नार्को-टेररिज्म’ विरोधी मुहिम का हिस्सा है, जो सितंबर की शुरुआत से जारी है।अमेरिकी दक्षिणी कमान (US Southern Command) ने रविवार को बयान जारी कर कहा कि खुफिया जानकारी के आधार पर नाव को निशाना बनाया गया। नाव एक ज्ञात ड्रग तस्करी रूट पर थी और मादक पदार्थ ले जा रही थी। यह सितंबर से अब तक का 21वां घातक हमला है, जिसमें कुल 83 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं।

सितंबर 2025 से शुरू हुई अमेरिकी मुहिम लगातार तेज होती गई है और अब यह पूर्वी प्रशांत महासागर में खुले अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्रों तक फैल चुकी है। 15 नवंबर 2025 को हुए ताज़ा हमले में अमेरिकी सेना की जॉइंट टास्क फोर्स साउदर्न स्पीयर ने एक नाव को निशाना बनाकर तीन लोगों को मार दिया। अमेरिकी रक्षा विभाग ने इन लोगों को नार्को-टेररिस्ट कहा, जबकि बयान में यह भी दावा किया गया कि यह नाव एक ऐसे संगठन द्वारा संचालित थी जिसे अमेरिका ने पहले से “डिज़िग्नेटेड टेररिस्ट ऑर्गेनाइजेशन” घोषित कर रखा है। अमेरिकी सेना ने सोशल मीडिया पर घोषणा करते हुए बताया कि नाव ड्रग्स ले जा रही थी और यह कार्रवाई रक्षा सचिव पीट हेगसेथ के निर्देश पर की गई।

यह हमला एक बड़े अभियान का हिस्सा है, जो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश पर 2 सितंबर 2025 से शुरू हुआ। इसका लक्ष्य अमेरिका में बढ़ रही फेंटानिल और कोकेन की तस्करी को समुद्र में रोकना है। ट्रंप प्रशासन ने कई ड्रग कार्टेल को औपचारिक रूप से विदेशी आतंकी संगठन घोषित किया और एक गोपनीय कानूनी व्याख्या के आधार पर इन तस्करों को अनलॉफुल कॉम्बेटेंट मानते हुए बिना किसी गिरफ्तारी या ट्रायल के सीधे हमले करने की अनुमति दी। पहले जहाँ US Coast Guard संदिग्ध नावों को रोककर उनकी तलाशी लेती थी, तस्करों को गिरफ्तार करती थी और ड्रग्स जब्त करती थी, अब पॉलिसी बदलकर सीधे मिसाइल या ड्रोन स्ट्राइक द्वारा नावें नष्ट की जा रही हैं।

सितंबर से नवंबर 2025 के बीच इस अभियान में कुल 21 हमले हो चुके हैं, जिनमें 22 से अधिक नावें नष्ट की गई हैं और लगभग 83 लोग मारे जा चुके हैं। केवल दो से तीन लोग ही जीवित बच पाए, जिन्हें बाद में उनके देशों को वापस भेज दिया गया। शुरूआती हमले कैरेबियन सागर में वेनेजुएला के पास हुए थे, जहाँ सात नावों पर कार्रवाई की गई और 32 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई। इसके बाद अभियान पूर्वी प्रशांत महासागर तक फैल गया, जहाँ नार्को-सबमरीन सहित कई लक्ष्यों को नष्ट किया गया। अक्टूबर के अंत से लेकर नवंबर की शुरुआत तक प्रशांत और कैरेबियन में कई बार हमले हुए, जिनमें कुल 23 से अधिक लोग मारे गए।

यह पूरी मुहिम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी विवाद का कारण बन गई है। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यह साफ़तौर पर एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग है, क्योंकि अमेरिका न तो कोई सबूत जारी कर रहा है, न ही मारे गए लोगों की पहचान या नावों पर बरामद allegedly ड्रग्स की तस्वीरें सार्वजनिक कर रहा है। कई अंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञों का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में बिना चेतावनी के घातक हमला करना समुद्री कानून का उल्लंघन है। कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो ने इन घटनाओं को “हत्या” कहा और अमेरिकी इंटेलिजेंस साझा करना बंद कर दिया। ब्रिटेन और कनाडा ने भी दूरी बना ली, खासकर ब्रिटेन ने ड्रग बोट्स पर इंटेलिजेंस शेयरिंग रोक दी। संयुक्त राष्ट्र ने इस अभियान पर गंभीर चिंता जताई है और जांच की मांग की है।

अमेरिकी कांग्रेस में भी कुछ सांसदों ने इन हमलों के कानूनी औचित्य और सबूतों पर सवाल उठाए, लेकिन रिपब्लिकन बहुमत के चलते किसी तरह की रोक नहीं लगाई गई। ट्रंप प्रशासन इसे अत्यंत सफल बताते हुए दावा करता है कि हर नष्ट की गई नाव से “25,000 अमेरिकी जिंदगियाँ बच सकती हैं”, जबकि कई विशेषज्ञ इसे राजनीतिक बयानबाज़ी बताते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका में ओवरडोज़ से होने वाली 1 लाख से अधिक वार्षिक मौतों का मुख्य कारण मैक्सिको से भूमि मार्ग से आने वाला फेंटानिल है, जबकि समुद्री मार्ग से मुख्यतः कोकेन आता है। तस्करों में समुद्री हमलों के बावजूद नए रास्तों को अपनाने की क्षमता है, इसलिए वास्तविक प्रभाव सीमित रहने की संभावना है।

इस अभियान ने क्षेत्रीय तनाव को भी बढ़ा दिया है, विशेष रूप से कोलंबिया और वेनेजुएला के साथ। यदि यह मुहिम आगे और बढ़ती है तो समुद्री क्षेत्रों में और कठोर सैन्य कदम देखने को मिल सकते हैं और संभव है कि अमेरिका नए क्षेत्रों में भी इसका विस्तार करे। कई विश्लेषकों का मानना है कि तस्करी पर निर्णायक असर डालने की बजाय यह अभियान विदेश नीति में टकराव और क्षेत्रीय अस्थिरता को और बढ़ा सकता है।

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