शरद पवार से शिंदे तक… महाराष्ट्र में बगावत और दलबदल की लंबी कहानी, जिसने बदल दी सत्ता की तस्वीर

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महाराष्ट्र की राजनीति में दलबदल, बगावत और राजनीतिक पुनर्संयोजन कोई नई बात नहीं है। राज्य का राजनीतिक इतिहास ऐसे कई घटनाक्रमों से भरा पड़ा है, जहां नेताओं ने अपनी ही पार्टी से अलग होकर नई राह चुनी और सत्ता का समीकरण बदल दिया। आज शिवसेना (UBT) जिस राजनीतिक संकट का सामना कर रही है, वैसी परिस्थितियां अतीत में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) भी झेल चुकी हैं।

इस कहानी की शुरुआत 1969 में कांग्रेस के पहले बड़े विभाजन से होती है। राष्ट्रपति चुनाव के बाद कांग्रेस दो हिस्सों में बंट गई। उस दौर में यशवंतराव चव्हाण और युवा नेता शरद पवार इंदिरा गांधी के साथ रहे। लेकिन 1977 में इंदिरा गांधी की चुनावी हार के बाद कांग्रेस फिर टूटी और कांग्रेस (I) तथा कांग्रेस (U) के रूप में दो धड़े सामने आए। शरद पवार अपने राजनीतिक गुरु यशवंतराव चव्हाण के साथ कांग्रेस (U) में चले गए।

हालांकि चुनाव के बाद दोनों गुटों ने जनता पार्टी को सत्ता से दूर रखने के लिए हाथ मिला लिया। वसंतदादा पाटिल मुख्यमंत्री बने और शरद पवार मंत्री। लेकिन इसी वर्ष शरद पवार ने कांग्रेस (U) से बगावत कर जनता पार्टी के साथ मिलकर प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट (PDF) बनाया और मात्र 38 वर्ष की उम्र में महाराष्ट्र के सबसे युवा मुख्यमंत्री बन गए। बाद में 1980 में इंदिरा गांधी ने उनकी सरकार बर्खास्त कर दी।

1987 में शरद पवार कांग्रेस में लौट आए, लेकिन 1999 में उन्होंने सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस से अलग होकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) की स्थापना कर दी। इसके बावजूद भाजपा-शिवसेना गठबंधन को सत्ता से दूर रखने के लिए कांग्रेस और एनसीपी ने मिलकर सरकार बनाई।

महाराष्ट्र की राजनीति में 2019 का घटनाक्रम भी बेहद नाटकीय रहा। विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर भाजपा और शिवसेना के बीच विवाद हुआ और गठबंधन टूट गया। इसके बाद अचानक देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री और अजित पवार ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। लेकिन यह सरकार महज पांच दिन ही चल सकी। शरद पवार ने राजनीतिक समीकरण बदलते हुए शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी को साथ लाकर महाविकास अघाड़ी (MVA) सरकार बनवा दी और उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने।

इसके बाद जून 2022 में महाराष्ट्र की राजनीति ने फिर करवट ली। एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना के अधिकांश विधायक अलग हो गए। उद्धव ठाकरे सरकार गिर गई और शिंदे भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बन गए। चुनाव आयोग ने बाद में शिंदे गुट को ही असली शिवसेना मान्यता दे दी।

जुलाई 2023 में इसी तरह एनसीपी में भी बड़ी टूट हुई। अजित पवार 41 विधायकों के साथ अलग हो गए और शिंदे सरकार में शामिल होकर उपमुख्यमंत्री बने। बाद में चुनाव आयोग ने अजित पवार गुट को असली एनसीपी का दर्जा दिया। इससे शरद पवार को पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह दोनों गंवाने पड़े।

अब 2026 में शिवसेना (UBT) एक बार फिर संकट में दिखाई दे रही है। लोकसभा चुनाव में जीतकर आए 9 सांसदों में से 6 सांसदों द्वारा अलग होने की पहल ने उद्धव ठाकरे की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। संसदीय दल की बैठक से इन सांसदों की गैरमौजूदगी ने एक नई राजनीतिक बहस को जन्म दिया है।

महाराष्ट्र का राजनीतिक इतिहास बताता है कि यहां चुनावी मुकाबले जितने दिलचस्प होते हैं, उससे कहीं ज्यादा रोचक सत्ता के लिए होने वाले राजनीतिक समीकरण, बगावत और दल-बदल होते हैं। यही कारण है कि महाराष्ट्र की राजनीति को देश की सबसे अप्रत्याशित और नाटकीय राजनीति माना जाता है।

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