खेती में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के बढ़ते इस्तेमाल से मिट्टी की उर्वरता, पर्यावरण और लोगों की सेहत पर असर पड़ रहा है। इसी को देखते हुए राजस्थान के बारां जिले में प्राकृतिक खेती को तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है।
जिले में फिलहाल 45 क्लस्टरों के माध्यम से 5,625 किसान प्राकृतिक खेती से जुड़ चुके हैं। सरकार किसानों को प्रशिक्षण देने के साथ-साथ आर्थिक सहायता भी उपलब्ध करा रही है।
कृषि विभाग के अधिकारियों के अनुसार, लगातार यूरिया, डीएपी और अन्य रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। साथ ही खाद्यान्नों में रासायनिक अवशेष बढ़ने से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का खतरा भी बढ़ रहा है।
इसके अलावा हर सीजन में यूरिया और डीएपी के लिए किसानों को लंबी कतारों में लगना पड़ता है। कई बार समय पर खाद नहीं मिलने से खेती प्रभावित होती है। ऐसे में प्राकृतिक खेती किसानों के लिए एक बेहतर और टिकाऊ विकल्प बनकर सामने आई है।
बारां जिले में प्रत्येक क्लस्टर में 125 किसानों का चयन किया गया है और उनकी 50 हेक्टेयर भूमि को इस योजना में शामिल किया गया है। प्रत्येक किसान की एक एकड़ भूमि पर प्राकृतिक खेती का प्रदर्शन कराया जा रहा है।
किसानों को प्राकृतिक खेती की तकनीक, मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के उपाय, प्राकृतिक खाद तैयार करने और फसलों की सुरक्षा के तरीके सिखाए जा रहे हैं।
प्राकृतिक खेती की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें किसी भी प्रकार के रासायनिक उर्वरक या कीटनाशक का उपयोग नहीं किया जाता।
किसान अपने खेत और घर में उपलब्ध संसाधनों से जीवामृत, बीजामृत, धनजीवामृत, पंचगव्य और वानस्पतिक काढ़ा तैयार कर रहे हैं। इन्हें बनाने के लिए गोबर, गोमूत्र, गुड़, बेसन, नीम की पत्तियां और अन्य प्राकृतिक सामग्री का उपयोग किया जाता है।
ये प्राकृतिक मिश्रण फसलों को जरूरी पोषक तत्व देने के साथ-साथ रोग और कीट नियंत्रण में भी मदद करते हैं। चूंकि अधिकांश सामग्री किसानों के पास पहले से उपलब्ध होती है, इसलिए खेती की लागत में भी उल्लेखनीय कमी आती है।
सरकार भी इस पहल को बढ़ावा देने के लिए चयनित प्रत्येक किसान को 4,000 रुपये का अनुदान दे रही है। इसके अलावा समय-समय पर प्रशिक्षण शिविर, फील्ड डेमो और तकनीकी मार्गदर्शन भी उपलब्ध कराया जा रहा है।
प्राकृतिक खेती से जुड़े किसानों का कहना है कि अब उन्हें यूरिया-डीएपी के लिए घंटों लाइन में नहीं लगना पड़ता। रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर होने वाला खर्च भी काफी कम हो गया है।
किसानों के मुताबिक, प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार हुआ है, उत्पादन लागत घटी है और फसलों की गुणवत्ता भी पहले से बेहतर हुई है। बिना केमिकल से उगाई गई सब्जियों और अन्य कृषि उत्पादों की बाजार में मांग भी लगातार बढ़ रही है।
बारां का यह मॉडल अब दूसरे किसानों के लिए भी प्रेरणा बन रहा है और यह दिखा रहा है कि आधुनिक तकनीक के साथ प्राकृतिक खेती अपनाकर कम लागत में टिकाऊ और लाभदायक कृषि की जा सकती है।