अय्यूब खान हाय-हाय… आज ही के दिन 58 साल पहले की वो सुबह, जब रावलपिंडी जागा और पाकिस्तान का इतिहास बदल गया

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यह 7 नवंबर 1968 की सुबह थी, जब पाकिस्तान की गलियों में पहली बार सत्ता के खिलाफ एक जनसैलाब उमड़ा था. महज गुस्से की आवाज नहीं थे, बल्कि एक पूरे युग के बदलाव का संकेत थे.

गुलाबी ठंड दस्तक दे चुकी थी. सुबह की ठंडी हवा में धुंध तैरने लगी थी. रावलपिंडी स्थित गॉर्डन कॉलेज के गेट के बाहर सैकड़ों छात्र इकट्ठा थे. हाथों में तख्तियां थीं. इनमें लिखा था- रोटी, आजादी और इन्साफ! और दिलों में उबाल. कोई एक बोलता – ‘अय्यूब खान हाय-हाय!’, तो बाकी भीड़ एक स्वर में जवाब देती ‘जम्हूरियत जिंदाबाद!’

यह 7 नवंबर 1968 की सुबह थी, जब पाकिस्तान की गलियों में पहली बार सत्ता के खिलाफ एक जनसैलाब उमड़ा था. महज गुस्से की आवाज नहीं थे, बल्कि एक पूरे युग के बदलाव का संकेत थे. यह वही आंदोलन था जिसने पाकिस्तान की राजनीति की दिशा मोड़ दी, और आने वाले वर्षों में जुल्फिकार अली भुट्टो जैसे नेताओं को जनता की आवाज बना दिया.

उस समय पाकिस्तान में जनरल अय्यूब खान का शासन था, जिन्होंने 1958 में सेना के जरिए सत्ता पर कब्जा किया था. शुरुआत में उन्हें ‘विकास का प्रतीक’ कहा गया, लेकिन 1960 के दशक के अंत तक उनकी आर्थिक नीतियों ने असमानता बढ़ा दी. शहरों में उद्योगपतियों की अमीरी और गांवों में बढ़ती गरीबी ने जनता को भीतर से तोड़ दिया. छात्रों का यह मार्च धीरे-धीरे रावलपिंडी शहर की नसों में फैलने लगा. दुकानदारों ने शटर गिरा दिए, राह चलते लोग झंडे थामने लगे, और सड़कें नारों से भर गईं. पुलिस ने पहले लाठीचार्ज किया, फिर आंसू गैस छोड़े, और आखिर में गोली चली. एक युवक मारा गया और उसी पल यह प्रदर्शन एक राष्ट्रीय आंदोलन में बदल गया.

उस दिन के बाद प्रदर्शन सिर्फ छात्रों तक सीमित नहीं रहे. कराची, लाहौर, पेशावर और ढाका तक आंदोलन फैल गया. फैक्ट्री मजदूर, पत्रकार, कलाकार सबने नारे बुलंद किए. यह वो वक्त था जब पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान एक ही मांग में एकजुट हुए-“लोकतंत्र चाहिए.” इसी दौर में उर्दू के महान शायर फैज अहमद फैज के शब्दों ने आंदोलन की आत्मा को आवाज दी. उनके शब्द, “बोल कि लब आजाद हैं तेरे” हर सभा में गूंजने लगे. फैज की पंक्तियां छात्रों के झंडों पर लिखी जाने लगीं, और रावलपिंडी की सड़कों पर शायरी और क्रांति एक हो गए.

राजनीतिक हलचल ने ज़ुल्फिकार अली भुट्टो को जनता का चेहरा बना दिया. वही आंदोलन जिसने अय्यूब खान के शासन को हिला दिया, आगे चलकर 1970 के चुनावों का रास्ता खोल गया. अय्यूब खान ने आंदोलन को “विद्रोह” बताया, लेकिन देश अब उनके खिलाफ खड़ा हो चुका था. फरवरी 1969 तक विरोध इतना तेज हो गया कि उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. सत्ता जनरल याह्या खान के हाथों में गई, जिन्होंने चुनाव करवाए और इन्हीं चुनावों ने शेख मुजीबुर रहमान को पूर्वी पाकिस्तान में भारी जीत दिलाई, जिसने 1971 में बांग्लादेश के निर्माण का रास्ता प्रशस्त किया.

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