EBC/OBC वोटर्स ने पिछले चुनाव में किसे दिया था वोट, किसका कटा था पत्ता

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पटना, सारण, मुजफ्फरपुर, गोपालगंज, सहरसा, नालंदा, बख्तियारपुर, मुंगेर, लखीसराय, बक्‍सर, समस्‍तीपुर, खगड़ि‍या जैसे क्षेत्रों में आने वाली विधानसभा सीटों पर वोट डाले गए. ये वो सीटें हैं जहां पर EBC/OBC की आबादी का अहम रोल है.

बिहार विधानसभा चुनाव का पहला चरण गुरुवार यानी 6 नवंबर को पूरा हो गया है. पहले चरण में कुल 121 सीटों पर वोट डाले गए हैं. इन 121 सीटों में कुछ सीटों पर ओबीसी या ईबीसी मतदाता का रोल सबसे अहम होने वाला है. 14 नवंबर को आने वाले नतीजों में ये वो मतदाता होने वाले हैं जिन्हें अगर ‘किंगमेकर’ कहा जाए तो गलत नहीं होगा. शायद इसी बात को ध्‍यान में रखकर ही एनडीए और महागठबंधन ने उम्मीदवारों को उतारा है. एक नजर डालिए 121 सीटों पर किन समीकरणों को ध्‍यान में रखकर टिकट दिया गया है.

आज बड़ी सीटों पर थी वोटिंग 

पटना, सारण, मुजफ्फरपुर, गोपालगंज, सहरसा, नालंदा, बख्तियारपुर, मुंगेर, लखीसराय, बक्‍सर, समस्‍तीपुर, खगड़ि‍या जैसे क्षेत्रों में आने वाली विधानसभा सीटों पर वोट डाले गए. ये वो सीटें हैं जहां पर EBC/OBC की आबादी का अहम रोल है. द इंडिया फोरम की रिपोर्ट के अनुसार 2015 में हुए चुनाव में जब नीतीश कुमार ने राष्‍ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के साथ हाथ मिलाया और चुनाव लड़ा तो उस समय 178 सीटें मिलीं. लेकिन 2017 में उनका इस गठबंधन से बाहर जाना इन मतदाताओं को अखर गया.

2020 में जब चुनाव हुए तो 58 फीसदी ईबीसी ने एनडीए को सपोर्ट किया और 125 सीटें उनके खाते में आईं जबकि महागठबंधन के हिस्‍से 110 सीटें आईं. मतदाता, खासतौर पर महिला मतदातर नीतीश कुमार की निषेध नीति और कैश ट्रांसफर स्‍कीम से खासे प्रभावित नजर आए. 2020 में EBC/OBC की 63 फीसदी महिलाओं ने एनडीए को समर्थन दिया तो वहीं 59 फीसदी पुरुष इसके समर्थन में नजर आए.

2020 में कैसे पड़ा था असर 

2023 की जाति जनगणना के अनुसार, राज्य की आबादी में EBC/OBC की हिस्सेदारी 36.01फीसदी है, जो यादवों (14.26 प्रतिशत), मुसलमानों (17.7 प्रतिशत) और उच्च जातियों (15.52 फीसदी ) से कहीं ज्‍यादा है. बाढ़ग्रस्त कोसी क्षेत्र में निषादों से लेकर शहरी पटना में कुम्हारों तक, 130 उप-जातियों के साथ, वे मिथिला, मगध और सीमांचल जैसे क्षेत्रों की 120 से ज्‍यादा सीटों पर प्रभाव रखते हैं. साल 2020 में, अति पिछड़ी जातियों के वोटों में सिर्फ 1 फीसदी का बदलाव 10 से 15 सीटों का रुख मोड़ सकता था, जो सरकार की किस्मत बदलने के लिए काफ़ी था.

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