मेरी योग्यता को मेरे परिवार से मत जोड़िए, भले ही अब मंत्री हूं लेकिन राजनीति में नया नहीं” बोले उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश

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राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बेटे और नए-नए मंत्री बने दीपक प्रकाश ने कहा है कि मेरी योग्यता को मेरे परिवार से मत जोड़िए।

पटना: राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बेटे और नए-नए मंत्री बने दीपक प्रकाश का बयान सामने आया है। उन्होंने कहा, “मेरी योग्यता को मेरे परिवार से मत जोड़िए। मुझे काम करने का मौका मिला है और मैं खुद को साबित करूंगा। मैं भले ही अब मंत्री हूं, लेकिन राजनीति में नया नहीं हूं। मैं काफी समय से सक्रिय हूं।”

शनिवार को पद संभालते ही पत्रकारों से हो गया था विवाद

शनिवार को मंत्री पद संभालते ही उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश का पत्रकारों से विवाद हो गया था। दीपक प्रकाश ने मंत्रालय में पहले दिन बैठने के साथ ही पत्रकारों से कहा, “आप लोग मेरा समय बर्बाद कर रहे हैं।” इसका वीडियो भी सामने आया है। बता दें कि भले ही दीपक प्रकाश ये दावा कर रहे हों कि वह राजनीति में नए नहीं हैं लेकिन उनके बारे में पब्लिक डोमेन में बहुत जानकारी उपलब्ध नहीं है।

दीपक प्रकाश मंत्री तो बन गए हैं, लेकिन अभी वो ना ही विधायक हैं और ना ही एमएलसी। ऐसे में 6 महीने के भीतर उन्हें  राज्य विधानमंडल के किसी एक सदन का सदस्य बनना होगा।

हालही में उपेंद्र कुशवाहा ने आलोचकों को दिया था जवाब

उपेंद्र कुशवाहा ने एक्स पर लिखा था, “कल से मैं देख रहा हूं, हमारी पार्टी के निर्णय को लेकर पक्ष और विपक्ष में आ रही प्रतिक्रियाएं उत्साहवर्धक भी, आलोचनात्मक भी! आलोचनाएं स्वस्थ भी हैं, कुछ दूषित और पूर्वाग्रह से ग्रसित भी। स्वस्थ आलोचनाओं का मैं हृदय से सम्मान करता हूं। ऐसी आलोचनाएं हमें बहुत कुछ सिखाती हैं, संभालती हैं। क्योंकि ऐसे आलोचकों का मकसद पवित्र होता है। दूषित आलोचनाएं सिर्फ आलोचकों की नियत का चित्रण करती हैं। दोनों प्रकार के आलोचकों से कुछ कहना चाहता हूं।”

उपेंद्र कुशवाहा ने एक्स पर लिखा था, “पहले स्वस्थ आलोचकों से:- आपने मेरे उपर परिवारवाद का आरोप लगाया है। मेरा पक्ष है कि अगर आपने हमारे निर्णय को परिवारवाद की श्रेणी में रखा है, तो जरा समझिए मेरी विवशता को। पार्टी के अस्तित्व व भविष्य को बचाने व बनाए रखने के लिए मेरा यह कदम जरुरी ही नहीं अपरिहार्य था। मैं तमाम कारणों का सार्वजनिक विश्लेषण नहीं कर सकता, लेकिन आप सभी जानते हैं कि पूर्व में पार्टी के विलय जैसा भी अलोकप्रिय और एक तरह से लगभग आत्मघाती निर्णय लेना पड़ा था। जिसकी तीखी आलोचना बिहार भर में हुई। उस वक्त भी बड़े संघर्ष के बाद आप सभी के आशीर्वाद से पार्टी ने सांसद, विधायक सब बनाए। लोग जीते और निकल लिए।  झोली खाली की खाली रही। शुन्य पर पहूंच गए। पुनः ऐसी स्थिति न आए, सोचना ज़रूरी था।”

उपेंद्र कुशवाहा ने लिखा था, “सवाल उठाइए, लेकिन जानिए। आज के हमारे निर्णय की जितनी आलोचना हो, लेकिन इसके बिना फिलहाल कोई दूसरा विकल्प फिर से शून्य तक पहुंचा सकता था। भविष्य में जनता का आशीर्वाद  कितना मिलेगा, मालूम नहीं। परन्तु खुद के स्टेप से शून्य तक पहुंचने का विकल्प खोलना उचित नहीं था। इतिहास की घटनाओं से यही मैंने सबक ली है।  समुद्र मंथन से अमृत और ज़हर दोनों निकलता है। कुछ लोगों को तो जहर पीना ही पड़ता है। वर्तमान के निर्णय से परिवारवाद का आरोप मेरे उपर लगेगा। यह जानते/समझते हुए भी निर्णय लेना पड़ा, जो मेरे लिए जहर पीने के बराबर था। फिर भी मैंने ऐसा निर्णय लिया। पार्टी को बनाए/बचाए रखने की जिद्द को मैंने प्राथमिकता दी। अपनी लोकप्रियता को कई बार जोखिम में डाले बिना कड़ा/बड़ा निर्णय लेना संभव नहीं होता। सो मैंने लिया।”

 

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