मध्य प्रदेश सरकार बुरहानपुर की 400 साल पुरानी मुगलकालीन ‘कुंडी भंडारा’ जल प्रणाली को फिर से जीवित करने की तैयारी में है। यह ऐतिहासिक जल संरचना बिना बिजली और पंप के केवल गुरुत्वाकर्षण (ग्रेविटी) के सहारे शहर तक पानी पहुंचाती थी। इस परियोजना के तहत भोपाल स्थित मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (MANIT) की विशेषज्ञ टीम चुंबकीय (मैग्नेटिक) और अन्य तकनीकी सर्वे कर रही है, जिसके आधार पर पुनर्जीवन की विस्तृत कार्ययोजना तैयार की जाएगी।
यह ऐतिहासिक प्रणाली मुगल काल में बुरहानपुर की जल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विकसित की गई थी और आज भी अपनी वैज्ञानिक संरचना के कारण इंजीनियरों एवं विशेषज्ञों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। इस धरोहर को यूनेस्को की संभावित विश्व धरोहर सूची में भी शामिल किया गया है।
इतिहासकारों के अनुसार, वर्ष 1615 में मुगल सम्राट जहांगीर के शासनकाल के दौरान तत्कालीन सूबेदार अब्दुल रहीम खान-ए-खाना ने फारसी ‘कनात’ तकनीक के आधार पर इस भूमिगत जल प्रणाली का निर्माण कराया था। करीब चार किलोमीटर लंबी भूमिगत सुरंगों और 108 वर्टिकल शाफ्ट (कुंडियों) से बनी यह संरचना सतपुड़ा क्षेत्र के भूजल को एकत्र कर बिना किसी मोटर या पंप के शहर तक पहुंचाती थी।
समय के साथ उपेक्षा और अतिक्रमण के कारण इस प्रणाली का बड़ा हिस्सा निष्क्रिय हो गया, लेकिन इसके कई हिस्से आज भी सुरक्षित हैं। इन्हीं संरचनाओं का वैज्ञानिक अध्ययन कर उन्हें दोबारा उपयोग में लाने की योजना बनाई जा रही है।
मध्य प्रदेश पुरातत्व विभाग और MANIT की टीम आधुनिक तकनीकों की मदद से भूमिगत नेटवर्क का सर्वे कर उसकी वर्तमान स्थिति का आकलन करेगी। सर्वे रिपोर्ट के आधार पर सरकार यह तय करेगी कि किन हिस्सों का संरक्षण, मरम्मत और पुनर्निर्माण किया जाए, ताकि इस ऐतिहासिक जल प्रणाली को फिर से संचालित किया जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह परियोजना सफल होती है तो इससे बुरहानपुर की जल आपूर्ति मजबूत होगी, भूजल संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा और ऊर्जा की बचत भी होगी, क्योंकि इस प्रणाली में बिजली या पंप की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसके साथ ही यह परियोजना देशभर में जल संरक्षण (Water Conservation) और जलवायु अनुकूल (Climate Resilient) पारंपरिक जल प्रबंधन का एक प्रभावी मॉडल बन सकती है।
सरकार का उद्देश्य केवल एक ऐतिहासिक धरोहर का संरक्षण करना नहीं है, बल्कि पारंपरिक भारतीय जल प्रबंधन तकनीकों को आधुनिक जरूरतों के अनुरूप फिर से उपयोग में लाकर टिकाऊ जल संसाधन प्रबंधन को बढ़ावा देना भी है।