झारखंड में आदिवासी समुदाय ने महारैली निकालकर कुड़मी समुदाय को आदिवासी मानने का विरोध किया। उन्होंने कहा कि कुड़मी समुदाय का आदिवासियों की संस्कृति से कोई मेल नहीं है। समुदाय ने सरकार से कुड़मी समुदाय को आदिवासी का दर्जा न देने की मांग की, ताकि उनकी अपनी पहचान बनी रहे।
आदिवासी पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था की अगुवाई में विशाल जनआक्रोश महारैली का आयोजन शुक्रवार को सरायकेला मुख्यालय में किया गया।
आदिवासी समुदाय के सैकड़ों महिला पुरुष इस महारैली में शामिल हुए। सरायकेला स्थित बिरसा मुंडा स्टेडियम में समुदाय के लोग जुटने लगे। फिर एक साथ कतारबद्ध होकर पैदल छह किलोमीटर तक नारेबाजी करते हुए उपायुक्त कार्यालय पहुंचे।
वहां विरोध प्रदर्शन करने के बाद राष्ट्रपति के नाम एक मांग पत्र उपायुक्त नीतिश कुमार सिंह को सौंपा। माझी परगना महाल के नवीन मुर्मू के नेतृत्व में महारैली उपायुक्त कार्यालय पहुंची।
मांग पत्र में माझी पारगना माहाल, आदिवासी पारंपरिक स्वसाशन व्यवस्था कुर्मी/कुड़मी, महतो समुदाय को आदिवासी अनुसूचित जनजाति श्रेणी में शामिल होने की मांग को खारिज कर कुड़मी समुदाय को अनुसूचित जनजाति श्रेणी में शामिल नहीं करने का आग्रह है।
कुड़मी अनुसूचित जनजाति घोषित करने के मानकों को पूरा नहीं करती
नवीन कुमार ने कहा कि कुड़मी समुदाय न कभी आदिवासी था और न है। जस्टिस बी एन लुकर समिति द्वारा बनाए गए अनुसूचित जनजाति घोषित करने के लिए 5 मानकों को यह पूरी नहीं करती है।
इनका आदिवासी समाज की पारंपरिक रीति रिवाज, पूजा पद्धति, धर्म संस्कृति, समाजिक क्रियाकलाप एवं व्यवहार में कोसों दूर-दूर तक कोई मेल नहीं खाता। उन्होंने कहा कि कुड़मियों का गोत्र आर्यों की तरह ऋषि मुनियों से जुड़ा हुआ है।
वे मंदिरों में हिंदू देवी देवताओं की पूजा करते हैं, अपने जन्म से लेकर मृत्यु तक का क्रियाकलाप ब्राह्मण पंडित द्वारा संपन्न कराते हैं जो हिंदू सनातन धर्म परंपरा के काफी करीब है। उनकी भाषा कुरमाली है जो आर्य भाषा के तहत आती है।