रूस-यूक्रेन युद्ध: मार्को रूबियो बोले—अमेरिका के बिना खत्म नहीं होगी जंग

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जहां कीव (यूक्रेन) को पश्चिम से सैन्य और वित्तीय मदद मिल रही है, वहीं मॉस्को अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद डटा हुआ है. अब पूरी दुनिया की नजरें अमेरिका के उस ‘शांति फॉर्मूले’ पर हैं, जिसकी चर्चा मार्को रूबियो कर रहे हैं.

World News in Hindi: रूस और यूक्रेन के बीच पिछले करीब तीन वर्षों से जारी भीषण युद्ध को लेकर अमेरिका ने अब तक का सबसे बड़ा दावा किया है. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो (Marco Rubio) ने शुक्रवार को स्पष्ट रूप से कहा कि पूरी दुनिया में केवल संयुक्त राज्य अमेरिका (America) ही वह इकलौती शक्ति है, जो रूस (Russia) और यूक्रेन (Ukraine) दोनों पक्षों को मेज पर लाकर इस युद्ध (War) को समाप्त करने का रास्ता निकाल सकती है.

‘धरती पर कोई दूसरा विकल्प नहीं’

साल के अंत में आयोजित एक महत्वपूर्ण प्रेस वार्ता में रूबियो ने कहा, ‘धरती पर सिर्फ एक ही देश और एक ही ऐसी संस्था है जो असल में दोनों पक्षों (रूस-यूक्रेन) से सीधा संवाद कर सकती है और शांति का रास्ता खोज सकती है, और वह है यूनाइटेड स्टेट्स.’ उन्होंने जोर देकर कहा कि वॉशिंगटन ने इस संघर्ष को सुलझाने के लिए न केवल सीनियर लेवल की भागीदारी दिखाई है, बल्कि अपना काफी कीमती समय भी लगाया है.

व्यापार से ज्यादा बैठकों का दौर

मार्को रूबियो ने खुलासा किया कि नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस युद्ध को लेकर कितने गंभीर हैं. उन्होंने बताया कि ट्रंप ने अपने हालिया कार्यकाल में यूक्रेन युद्ध पर किसी भी दूसरे विषय (यहां तक कि ट्रेड और इकोनॉमी भी) से ज्यादा बैठकें की हैं. हालांकि, रूबियो ने एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण भी दिया. उन्होंने कहा कि अमेरिका किसी भी देश पर अपनी कोई ‘डील’ थोपना नहीं चाहता. यह बातचीत इस बारे में है कि दोनों पक्ष असल में क्या चाहते हैं और शांति के बदले वे क्या छोड़ने या देने को तैयार हैं.

शांति की चाबी पुतिन और जेलेंस्की के पास

अमेरिकी विदेश मंत्री ने साफ किया कि शांति का अंतिम फैसला अमेरिका नहीं करेगा. रूबियो ने कहा, ‘यह फैसला अंततः यूक्रेन और रूस का होगा. इसमें बहुत समय और मेहनत लगती है, और ऐसे प्रयास मीडिया या प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं बल्कि बंद दरवाजों के पीछे कूटनीति से सफल होते हैं.

बदल गई दुनिया की सुरक्षा व्यवस्था

फरवरी 2022 में रूस के हमले के बाद शुरू हुआ यह संघर्ष दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूरोप का सबसे बड़ा सैन्य संकट बन चुका है. इस जंग ने ग्लोबल एनर्जी मार्केट को पूरी तरह अस्थिर कर दिया है. यूरोपीय सुरक्षा व्यवस्था को नया स्वरूप दिया है. डिप्लोमेटिक गठबंधनों को फिर से परिभाषित किया है (जैसे रूस का उत्तर कोरिया और चीन के करीब जाना). जहां कीव (यूक्रेन) को पश्चिम से सैन्य और वित्तीय मदद मिल रही है, वहीं मॉस्को अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद डटा हुआ है. अब पूरी दुनिया की नजरें अमेरिका के उस ‘शांति फॉर्मूले’ पर हैं, जिसकी चर्चा मार्को रूबियो कर रहे हैं.

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