भारत में आईपीओ की तेज़ी हमेशा विकास का संकेत क्यों नहीं होती? निवेशकों के लिए चेतावनी की घंटी

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भारत में आईपीओ (आरंभिक सार्वजनिक निर्गम) हमेशा विकास का संकेत नहीं होता, भले ही यह शेयर बाज़ार में उत्साह और हलचल पैदा करता है। निवेशकों के लिए यह तेज़ी से मुनाफ़ा कमाने का अवसर लगता है — लिस्टिंग गेन, प्रचार और अल्पकालिक लाभ — लेकिन इसके पीछे की सच्चाई इससे कहीं ज़्यादा जटिल है।

ज़ैक्टर मनी के सह-संस्थापक, चार्टर्ड अकाउंटेंट अभिषेक वालिया के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में भारत में आईपीओ के ज़रिए जुटाई गई बड़ी राशि का बड़ा हिस्सा असल में नई परियोजनाओं या औद्योगिक विस्तार के लिए नहीं जाता। पिछले पाँच वर्षों में भारतीय कंपनियों ने आईपीओ के माध्यम से पाँच लाख करोड़ रुपये से अधिक जुटाए, लेकिन इसमें से लगभग 3.3 लाख करोड़ रुपये केवल प्रमोटरों और निजी इक्विटी निवेशकों के हाथों में वापस चले गए। यानी, यह पैसा कंपनियों के विकास की बजाय “कैश आउट” का ज़रिया बन गया।

वालिया बताते हैं कि हर 100 रुपये में से केवल 19 रुपये नई प्लांट या मशीनरी पर खर्च हुए, 19 रुपये कार्यशील पूंजी के लिए उपयोग में आए, और लगभग एक तिहाई हिस्सा पुराने कर्ज़ चुकाने में गया। शेष राशि सीधे प्रमोटरों और शुरुआती निवेशकों के पास लौट आई। इसका अर्थ यह हुआ कि आईपीओ का उद्देश्य कंपनियों की क्षमता बढ़ाना नहीं, बल्कि अंदरूनी लोगों को मुनाफ़े के साथ बाहर निकलने का अवसर देना बन गया है।

CA अभिषेक वालिया

भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने भी अपने हालिया बुलेटिन में इस असंतुलन की ओर संकेत किया है। उसने लिखा कि शेयर बाज़ार में तेजी के बावजूद परियोजना वित्त और औद्योगिक निवेश में सुस्ती बनी हुई है। यह दिखाता है कि आईपीओ से जुटाए गए फंड्स का बड़ा हिस्सा उत्पादक निवेश में नहीं जा रहा, जिससे अर्थव्यवस्था की वास्तविक विकास दर प्रभावित हो रही है।

निवेशकों के रिटर्न के आँकड़े भी इस असली तस्वीर को उजागर करते हैं। 2024 में लगभग 41% आईपीओ ने निवेशकों को 25% से अधिक का रिटर्न दिया, लेकिन 2025 में यह संख्या घटकर केवल 15% रह गई। वहीं 2021 से अब तक लगभग 27% आईपीओ अपने इश्यू प्राइस से नीचे लिस्ट हुए। इसका मतलब यह हुआ कि आईपीओ में निवेश हमेशा लाभदायक नहीं रहा, बल्कि कई मामलों में खुदरा निवेशकों को नुकसान भी उठाना पड़ा।

इसलिए, सवाल यह नहीं है कि आईपीओ अच्छे हैं या बुरे — बल्कि यह है कि उनके पीछे की मंशा क्या है। जब कंपनियाँ आईपीओ फंड्स का उपयोग नई परियोजनाओं, विस्तार, या रोजगार सृजन के लिए करती हैं, तो यह वास्तव में आर्थिक विकास का संकेत होता है। लेकिन जब यही फंड प्रमोटरों की निकासी या निजी निवेशकों के लाभ के लिए उपयोग होता है, तो यह केवल बाज़ार में अस्थायी उत्साह पैदा करता है, दीर्घकालिक विकास नहीं।

अभिषेक वालिया का निष्कर्ष सरल लेकिन गहरा है — “भारत में आईपीओ का उछाल विकास का संकेत नहीं, बल्कि मुद्रीकरण के आत्मविश्वास का प्रतीक है।” जब तक कंपनियों का ध्यान विस्तार और नवाचार पर नहीं जाता, तब तक असली लाभ खुदरा निवेशकों को नहीं, बल्कि उन लोगों को होता रहेगा जो आईपीओ लॉन्च करते हैं।

इस तरह, आईपीओ की चमकदार सुर्खियों के पीछे छिपा यथार्थ यह बताता है कि पूंजी बाज़ार का उभार और वास्तविक आर्थिक प्रगति हमेशा एक ही बात नहीं होते।

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