अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो इस हफ्ते भारत दौरे पर पहुंच रहे हैं, लेकिन इस यात्रा को सिर्फ एक सामान्य कूटनीतिक दौरा नहीं माना जा रहा। पिछले करीब 25 सालों से अमेरिका की विदेश नीति में भारत को एक अहम रणनीतिक साझेदार माना जाता रहा है। रिपब्लिकन हो या डेमोक्रेट—हर अमेरिकी प्रशासन ने भारत को चीन के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ एशिया में एक मजबूत संतुलन के रूप में देखा। लेकिन अब डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिकी प्राथमिकताएं बदलती हुई दिखाई दे रही हैं।
रूबियो की यह यात्रा केवल नई दिल्ली तक सीमित नहीं रहेगी। उनके कोलकाता, आगरा और जयपुर जाने का भी कार्यक्रम है। माना जा रहा है कि अमेरिका इस दौरे के जरिए सिर्फ राजनीतिक नेतृत्व ही नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति, समाज और आम जनता से भी जुड़ाव दिखाना चाहता है। कोलकाता में ऐतिहासिक अमेरिकी वाणिज्य दूतावास और मदर टेरेसा से जुड़े स्थलों, आगरा में ताजमहल और जयपुर की सांस्कृतिक विरासत को इस यात्रा का हिस्सा बनाया गया है।
लेकिन इस दौरे के पीछे सबसे बड़ा सवाल अमेरिका की बदलती विदेश नीति को लेकर है। पहले अमेरिका इंडो-पैसिफिक रणनीति के तहत भारत को चीन के खिलाफ एक अहम साझेदार मानता था। क्वाड जैसे मंचों को भी इसी रणनीतिक सोच का हिस्सा माना गया। मगर ट्रंप प्रशासन की नई नीति रिश्तों को रणनीतिक साझेदारी से ज्यादा व्यापारिक फायदे और “डील” के नजरिए से देखने लगी है।
इसी सोच के तहत ट्रंप पहले भारत पर भारी टैरिफ लगा चुके हैं, चीन के साथ अपने संबंधों की तारीफ कर चुके हैं और पाकिस्तान के साथ संपर्क बढ़ाने के संकेत भी दिए हैं। वहीं अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा दस्तावेजों में भारत का जिक्र पहले की तुलना में सीमित नजर आया है।
भारत के लिए यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका उसका सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद शुरू हुई भारत-अमेरिका की नई साझेदारी पिछले दो दशकों में लगातार मजबूत हुई थी। दोनों देशों के बीच लोकतंत्र, सुरक्षा और चीन को लेकर साझा चिंताओं ने रिश्तों को गहराई दी।
अब मार्को रूबियो का यह दौरा सिर्फ एक विदेश मंत्री की यात्रा नहीं माना जा रहा, बल्कि यह संकेत माना जा रहा है कि आने वाले समय में अमेरिका भारत को किस नजरिए से देखेगा—एक रणनीतिक सहयोगी के रूप में या सिर्फ व्यापारिक साझेदार के तौर पर।