वर्कर वीज़ा से लेकर एच-1बी तक: अमेरिकी वीज़ा नियमों में बदलाव का भारतीयों पर गहरा असर

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अमेरिकी वीज़ा नियमों में हाल के बदलावों ने भारतीय नागरिकों, खासकर अस्थायी कामगारों, छात्रों और एच-1बी वीज़ा धारकों पर व्यापक असर डाला है। ट्रम्प प्रशासन ने पिछले कुछ महीनों में कई नीतिगत कदम उठाए हैं, जिनका उद्देश्य अमेरिकी नागरिकों के लिए रोज़गार अवसरों को प्राथमिकता देना बताया गया है, लेकिन इनसे भारतीय समुदाय की स्थिति जटिल हो गई है।

सबसे पहले, विदेशी श्रमिकों के लिए श्रमिक वीज़ा पर रोक ने उन भारतीय ड्राइवरों को प्रभावित किया है जिन्होंने ट्रकिंग उद्योग में वर्षों से अपनी पहचान बनाई थी। कैलिफ़ोर्निया और अन्य राज्यों में बड़ी संख्या में सिख और भारतीय मूल के ट्रक ड्राइवर काम कर रहे थे, जिन्होंने अमेरिकी ट्रकिंग क्षेत्र में श्रमिकों की कमी को पूरा किया। अब इस रोक से न केवल नए ड्राइवरों का प्रवेश रुकेगा, बल्कि जिन लोगों ने आवेदन की प्रक्रिया में निवेश किया था, उन्हें आर्थिक नुकसान और अस्थिरता का सामना करना पड़ेगा।

इसके बाद, नई छात्र वीज़ा नीति ने भारत से अमेरिका जाने वाले छात्रों के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। एफ और जे वीज़ा की अवधि अब अधिकतम चार वर्ष तक सीमित कर दी गई है, जिससे छात्रों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेने वालों को बार-बार नवीनीकरण के लिए आवेदन करना पड़ेगा। इस कदम से भारतीय छात्रों की संख्या में गिरावट और उनके शैक्षणिक तथा पेशेवर अवसरों में कमी आने की संभावना है।

सितंबर में लागू किए गए साक्षात्कार नियुक्तियों से जुड़े नए नियमों ने भी भारतीय आवेदकों के लिए प्रक्रिया को कठिन बना दिया है। अब गैर-आप्रवासी वीज़ा आवेदकों को केवल अपने देश में ही साक्षात्कार देना होगा। पहले, वे अन्य देशों में जल्दी अपॉइंटमेंट लेकर प्रक्रिया को तेज़ कर सकते थे, लेकिन अब यह विकल्प समाप्त हो गया है। इसका परिणाम यह होगा कि भारत में वीज़ा साक्षात्कारों के लिए लंबा इंतज़ार करना पड़ेगा, जिससे छात्रों, पेशेवरों और परिवारों की योजनाएं प्रभावित होंगी।

एच-1बी वीज़ा के शुल्क में भारी वृद्धि ने भारतीय आईटी और इंजीनियरिंग पेशेवरों के लिए चिंता बढ़ा दी है। 100,000 डॉलर की एकमुश्त फीस ने कंपनियों और उम्मीदवारों दोनों पर वित्तीय दबाव डाला है। इस कार्यक्रम के तहत 70 प्रतिशत वीज़ा भारतीयों को मिलते हैं, और लगभग तीन लाख उच्च-कुशल भारतीय पेशेवर वर्तमान में अमेरिका में इसी वीज़ा पर काम कर रहे हैं। शुल्क वृद्धि का तर्क यह दिया गया है कि इससे केवल उच्च योग्य विदेशी ही प्रवेश पा सकेंगे, लेकिन वास्तविकता यह है कि इससे भारतीय तकनीकी कंपनियों और स्टार्टअप्स की अमेरिका में प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति कमजोर होगी।

इसके साथ ही, स्वचालित कार्य परमिट नवीनीकरण की समाप्ति ने हजारों भारतीय पेशेवरों और उनके परिवारों को अस्थिरता की स्थिति में डाल दिया है। पहले, यदि नवीनीकरण आवेदन लंबित होता था, तो व्यक्ति कार्यरत रह सकता था, लेकिन अब मंज़ूरी मिलने तक वह नौकरी नहीं कर सकेगा। इससे एच-1बी धारकों के आश्रितों, विशेषकर एच4 वीज़ा धारकों, की आय और करियर दोनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

कुल मिलाकर, इन नीतिगत बदलावों ने अमेरिका में भारतीय प्रवासियों के लिए असुरक्षा और अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है। चाहे वे छात्र हों, तकनीकी विशेषज्ञ हों या ट्रक ड्राइवर—हर वर्ग किसी न किसी रूप में प्रभावित हुआ है। जहां अमेरिकी सरकार इन नीतियों को स्थानीय रोजगार संरक्षण के रूप में देखती है, वहीं भारतीय समुदाय के लिए यह उनकी उपलब्धियों, स्थिरता और अमेरिका में बने करियर के भविष्य पर एक गहरा प्रश्नचिह्न है।

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