TET अनिवार्यता के खिलाफ शिक्षकों का बड़ा आंदोलन, 22 जून को सचिवालय घेराव; 7 राज्यों का समर्थन

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उत्तराखंड में टीईटी (TET) अनिवार्यता और पुरानी पेंशन योजना (OPS) की बहाली को लेकर शिक्षकों का आंदोलन तेज हो गया है। उत्तराखंड राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ ने 22 जून को देहरादून में सचिवालय घेराव और महाआंदोलन का ऐलान किया है। इस आंदोलन को देश के कई राज्यों के शिक्षक संगठनों का समर्थन भी मिल गया है।

शिक्षक संघ के अनुसार दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, गुजरात और असम के शिक्षक संगठनों के साथ-साथ अखिल भारतीय प्राथमिक शिक्षक संघ ने भी आंदोलन के समर्थन की घोषणा की है। 22 जून को प्रदेश के विभिन्न जिलों से हजारों शिक्षक देहरादून के परेड ग्राउंड में एकत्र होंगे और वहां से सचिवालय तक मार्च करेंगे।

शिक्षकों की प्रमुख मांग है कि 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों को टीईटी अनिवार्यता से छूट दी जाए और पुरानी पेंशन योजना को बहाल किया जाए। संघ का कहना है कि जिन शिक्षकों ने 15 से 25 वर्षों या उससे अधिक समय तक सेवा दी है, उन पर अब नई पात्रता शर्तें लागू करना न्यायसंगत नहीं है।

शिक्षक नेताओं का दावा है कि देशभर में 25 से 30 लाख और उत्तराखंड में करीब 15 हजार शिक्षक इस नियम से प्रभावित हो सकते हैं। उनका कहना है कि वर्षों की संतोषजनक सेवा और विभिन्न प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद दोबारा पात्रता परीक्षा की शर्त लगाना शिक्षकों की सेवा सुरक्षा और आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।

पूरा विवाद सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें शिक्षकों के लिए टीईटी या सीटीईटी योग्यता अनिवार्य करने की बात कही गई थी। आदेश के अनुसार जिन शिक्षकों की सेवानिवृत्ति में पांच वर्ष से कम समय बचा है, उन्हें छूट दी गई है, जबकि अन्य शिक्षकों को निर्धारित समय सीमा के भीतर पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण करनी होगी।

उत्तराखंड राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ के नेताओं का कहना है कि 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों के लिए यह नियम लागू नहीं होना चाहिए, क्योंकि उस समय टीईटी की अनिवार्यता अस्तित्व में नहीं थी। उनका तर्क है कि नई भर्ती शर्तों को पहले से कार्यरत कर्मचारियों पर लागू करना उचित नहीं है।

शिक्षक संघ ने स्पष्ट किया है कि जब तक उनकी मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। ऐसे में 22 जून का प्रस्तावित सचिवालय कूच उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था और शिक्षक संगठनों के लिए एक बड़ा शक्ति प्रदर्शन माना जा रहा है।

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