क्योँ तुलसी के बिना माना जाता है प्रसाद अधुरा

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शास्त्रों के अनुसार भगवान् को प्रसाद चढाने के पीछे वजह ये है कि श्रीमद् भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण खुद ये कहते है, कि यदि कोई भक्त प्रेमभाव से मुझे फूल, फल, अन्न, जल आदि सब अर्पण करता है, तो उसे मैं सगुण प्रकट होकर ग्रहण करता हूं। इसलिए ये बात कभी न भूले कि भगवान की कृपा से जो जल और अन्न हमें प्राप्त होता है, उसे भगवान को भी अर्पित जरूर करना चाहिए।

ऐसे में भगवान् के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए ही उन्हें भोग लगाया जाता है। इसके साथ ही ऐसी मान्यता है कि भोग लगाने के बाद ग्रहण किया गया अन्न दिव्य हो जाता है। वो इसलिए क्योंकि उसमें तुलसी दल होता है। गौरतलब है, कि यदि भगवान को प्रसाद चढ़ाए और उसमे तुलसी दल न डाले तो भोग अधूरा ही माना जाता है।

आपको बता दे कि तुलसी को परंपरा स्वरुप भोग में रखा जाता है। वैसे इसका एक और कारण तुलसी दल का औषधीय गुण भी है। आपको शायद मालूम न हो, लेकिन एकमात्र तुलसी में यह गुणवत्ता है कि इसका मात्र एक ही पत्ता रोगप्रतिरोधक करने की क्षमता रखता है। यानि यह एंटीबायोटिक होता है।

बस इस तरह तुलसी स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी मानी जाती है। इसके इलावा तुलसी का पौधा मलेरिया के कीटाणु भी खत्म करता है। यहाँ तक कि तुलसी के स्पर्श से ही रोग दूर हो जाते है। वही तुलसी पर किए गए प्रयोगों से यह सिद्ध हुआ है, कि ब्लड प्रेशर और डायजेशन में संतुलन रखने के इलावा यह मानसिक रोगों के लिए भी लाभकारी है।

इसलिए तो कहते है, कि भगवान को भोग लगाने के बाद उसमें तुलसी डाल कर प्रसाद ग्रहण करने से वह भोजन अमृत रूपी बन कर शरीर तक पहुंचता है। इसके साथ ही ऐसी मान्यता है कि भगवान को प्रसाद चढ़ाने से घर में अन्न के भंडार हमेशा भरे रहते हैं।

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