लालकृष्ण आडवाणी ने कब लड़ा था अपना पहला लोकसभा चुनाव? 1991 में किससे हारते-हारते बचे थे?

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लालकृष्ण आडवाणी ने 1989 में पहली बार नई दिल्ली से लोकसभा चुनाव लड़ा और कांग्रेस की वी. मोहिनी गिरी को हराया। 1991 में उन्होंने नई दिल्ली से राजेश खन्ना के खिलाफ चुनाव लड़ा और मात्र 1589 वोटों के अंतर से जीतकर बच निकले। बाद में उन्होंने गांधीनगर सीट रखी।

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और देश के पूर्व उपप्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी शनिवार को 98 वर्ष के हो गए। 8 नवंबर को उनके जन्मदिन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित पार्टी के तमाम बड़े नेताओं ने दिली बधाई दी। पीएम मोदी ने आडवाणी को ‘ऊंचे दृष्टिकोण और बुद्धिमत्ता से संपन्न राजनेता’ बताया और कहा कि उन्होंने अपना पूरा जीवन भारत की तरक्की के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने आडवाणी की लंबी उम्र और अच्छी सेहत की कामना की, साथ ही उनकी निस्वार्थ सेवा और अटूट सिद्धांतों की तारीफ की।

1989 में पहली बार लोकसभा चुनाव लड़े

लालकृष्ण आडवाणी बीजेपी के संस्थापक नेताओं में से एक हैं। इससे पहले वह बीजेपी की पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ के बड़े नेता थे। उन्होंने 1970 में पहली बार राज्यसभा का चुनाव जीता और 1989 तक 4 बार राज्यसभा सदस्य रहे। साल 1989 में उन्होंने पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा। नई दिल्ली सीट से उन्होंने कांग्रेस की वी. मोहिनी गिरी को हराकर शानदार जीत हासिल की। इसके साथ ही उनकी लोकसभा की यात्रा शुरू हुई।

1991 में आडवाणी बनाम राजेश खन्ना

1991 के आम चुनाव में आडवाणी ने 2 सीटों से चुनाव लड़ा, गुजरात की गांधीनगर और नई दिल्ली। नई दिल्ली में उनका मुकाबला बॉलीवुड के सुपरस्टार राजेश खन्ना से था, जो कांग्रेस के टिकट पर मैदान में उतरे थे। पूरे देश की निगाहें नई दिल्ली लोकसभा सीट पर थी क्योंकि एक तरफ राजनीति के दिग्गज थे तो दूसरी तरफ फिल्मों को सुपरस्टार। मुकाबला इतना रोमांचक था कि आडवाणी सिर्फ 1589 वोटों के अंतर से जीते और राजेश खन्ना चूक गए। आखिरकार आडवाणी ने दोनों सीटें जीत लीं, लेकिन नियम के अनुसार एक सीट छोड़नी पड़ी। उन्होंने गांधीनगर सीट रखी और नई दिल्ली की सीट छोड़ दी। यह चुनाव इतिहास के सबसे चर्चित मुकाबलों में से एक बन गया।

बीजेपी को राष्ट्रीय पार्टी बनाने में अहम योगदान

आपातकाल के बाद आडवाणी ने जनसंघ को जनता पार्टी में मिलाने में अहम भूमिका निभाई। फिर 1980 में अटल बिहारी वाजपेयी के साथ मिलकर बीजेपी की स्थापना की। वह सबसे लंबे समय तक बीजेपी के अध्यक्ष रहे। उनके नेतृत्व में 1984 में सिर्फ 2 सीटों वाली पार्टी 1998 में 182 सीटों तक पहुंच गई। आडवाणी 1989 से लोकसभा के सदस्य रहे और 2019 में संन्यास तक 7 बार लोकसभा पहुंचे। ज्यादातर समय उन्होंने गांधीनगर सीट का प्रतिनिधित्व किया। वह 1998-2004 तक देश के गृह मंत्री रहे और 2002-2004 तक उन्होंने उपप्रधानमंत्री की जिम्मेदारी संभाली।

आडवाणी के नाम दर्ज हैं कई उपलब्धियां

पोखरण-2 परमाणु परीक्षण, लाहौर बस सेवा, कारगिल युद्ध, आतंकवाद निरोधक कानून (पोटा), राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की स्थापना में आडवाणी की बड़ी भूमिका रही। आडवाणी को उनकी राष्ट्रवादी सोच, शानदार वक्तृत्व, विचारों की स्पष्टता और संगठन कौशल के लिए याद किया जाता है। नरेंद्र मोदी, अरुण जेटली और सुषमा स्वराज जैसे नेताओं को उन्होंने तैयार किया। NDA गठबंधन को मजबूत बनाने में भी उनका बड़ा योगदान रहा। हाल के दिनों में आडवाणी की तबीयत कुछ नरम रही है और वे कई बार अस्पताल में भर्ती भी हुए हैं। देश उन्हें उनके जन्मदिन पर लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की शुभकामनाएं दे रहा है।

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