पाक-अफगान शांति वार्ता में रुकावट की असली वजह भारत नहीं, बल्कि अमेरिकी ड्रोन हैं

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तुर्की में हुई पाकिस्तान-अफगानिस्तान शांति वार्ता विफल हो गई है। जहाँ पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इसके लिए भारत को ज़िम्मेदार ठहराया, वहीं असलियत कुछ और ही सामने आई है। सूत्रों के मुताबिक, वार्ता के टूटने की असली वजह पाकिस्तान की अमेरिका को अपने क्षेत्र से ड्रोन उड़ान की अनुमति देना थी — न कि भारत का कोई हस्तक्षेप।

टोलो न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, अफ़ग़ान वार्ताकारों ने यह साफ़ किया कि काबुल तभी पाकिस्तान के ख़िलाफ़ हमलों को रोकने का वादा करेगा, जब इस्लामाबाद अपने हवाई क्षेत्र से अमेरिकी ड्रोन उड़ानें बंद करेगा। लेकिन, पाकिस्तान ने इस शर्त को मानने से इंकार कर दिया। पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल ने पहले सहमति जताई, मगर एक फोन कॉल के बाद—संभवतः उच्च सैन्य कमान से—अपना रुख़ बदल लिया। उन्होंने कहा कि “अमेरिकी ड्रोन पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है।” कतर और तुर्की के मध्यस्थ भी पाकिस्तान के इस व्यवहार से हैरान रह गए। इस बदलाव के बाद वार्ता ठप हो गई, और इस्लामाबाद ने जिम्मेदारी से बचने के लिए भारत पर आरोप लगा दिया।

काबुल स्थित पत्रकार तमीम बहिस ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर लिखा — “अफ़ग़ान मीडिया के मुताबिक़ पाकिस्तान ने पहली बार स्वीकार किया कि उसने एक विदेशी देश (अमेरिका) के साथ ऐसा समझौता किया है जो अफ़ग़ानिस्तान के अंदर निगरानी और हमलों के लिए ड्रोन संचालन की अनुमति देता है।” टोलो न्यूज़ ने भी पुष्टि की कि पाकिस्तान ने अमेरिका के साथ ड्रोन उड़ानों का समझौता आधिकारिक रूप से स्वीकार किया, और दावा किया कि वह इसे तोड़ नहीं सकता। वार्ता विफल होने के बाद, रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने भारतीय प्रभाव का हवाला देते हुए कहा — “काबुल में बैठे लोग जो कठपुतली का तमाशा रच रहे हैं, उन्हें दिल्ली नियंत्रित कर रही है।” उन्होंने आगे चेतावनी दी कि अगर अफ़ग़ानिस्तान ने पाकिस्तान के खिलाफ़ गतिविधियाँ नहीं रोकीं, तो उसे “तोरा बोरा की पराजय की पुनरावृत्ति” देखने को मिलेगी। लेकिन आसिफ ने यह नहीं बताया कि वार्ता के दौरान अमेरिकी ड्रोन पर पाकिस्तान की स्वीकारोक्ति के बाद उसकी टीम का व्यवहार अचानक क्यों बदल गया। सितंबर की शुरुआत में पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच संघर्ष बढ़ गया था। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के हमलों के बाद पाकिस्तानी वायुसेना ने काबुल और कंधार में हवाई हमले किए। इन हमलों में 200 से अधिक लोगों की मौत हुई,
जिनमें महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे। अफ़ग़ानिस्तान ने इन हमलों को “संप्रभुता का उल्लंघन” बताया है। काबुल स्थित पत्रकार अली एम. लतीफी ने लिखा — “पाकिस्तान का यह स्वीकार करना कि अमेरिकी ड्रोन उसके क्षेत्र से उड़ते हैं, बेहद विडंबनापूर्ण है — वही पाकिस्तान जो ओबामा के दौर में ड्रोन हमलों का शिकार था।” राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में इस्लामाबाद ने वॉशिंगटन के साथ अपने रक्षा और रणनीतिक संबंध मजबूत किए हैं। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख असीम मुनीर ने हाल ही में ओवल ऑफिस की यात्रा के दौरान ट्रंप से मुलाकात की थी। ट्रंप ने बगराम एयरबेस को अफ़ग़ानिस्तान से “वापस लेने” की मांग की है, और चेतावनी दी है कि यदि ऐसा नहीं हुआ तो “बुरी घटनाएँ घट सकती हैं।” तुर्की में हुई इस वार्ता की विफलता का कारण भारत नहीं, बल्कि पाकिस्तान की अमेरिका पर निर्भरता और ड्रोन समझौते में उसकी लाचारी रही। अफ़ग़ानिस्तान चाहता है कि पाकिस्तानी ज़मीन से ड्रोन हमले बंद हों —
पर इस्लामाबाद ऐसा करने में असमर्थ है। नतीजा यह कि, वार्ता फिर से वहीं पहुँच गई जहाँ से शुरू हुई थी — अविश्वास और आरोपों के घेरे में।

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