नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को महिला आरक्षण कानून को लागू करने की मांग वाली याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। यह कानून लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान करता है।
न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि महिलाएं देश की सबसे बड़ी “अल्पसंख्यक” समूह हैं, क्योंकि कुल जनसंख्या का लगभग 48% होने के बावजूद उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व बेहद कम है।
पीठ ने कहा,
“संविधान की प्रस्तावना राजनीतिक और सामाजिक समानता की बात करती है। इस देश में सबसे बड़ा अल्पसंख्यक कौन है? महिलाएं।”
यह मामला कांग्रेस नेता जया ठाकुर द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है जिसमें मांग की गई है कि नई जनगणना और परिसीमन (Delimitation) का इंतजार किए बिना महिला आरक्षण कानून को तत्काल लागू किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और सीमाएँ
हालांकि पीठ ने यह भी कहा कि नीतिगत मामलों में न्यायालय की सीमाएँ होती हैं और कानून लागू करना कार्यपालिका (केंद्र सरकार) का अधिकार है। कोर्ट ने कहा:
“परिसीमन कब होगा, यह सरकार का निर्णय है। हम इस पर बाध्यकारी आदेश जारी नहीं कर सकते।”
क्या है विवाद?
महिला आरक्षण विधेयक को लोकसभा ने 20 सितंबर 2023 को राज्यसभा ने 21 सितंबर 2023 को पारित किया था और 28 सितंबर 2023 को इसे राष्ट्रपति की मंजूरी मिली। लेकिन कानून को लागू करना अगली जनगणना और उसके आधार पर होने वाले परिसीमन पर निर्भर रखा गया है।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि:
इससे कानून अनिश्चित समय तक टल सकता है , जबकि 33% आरक्षण मौजूदा सीटों पर भी तुरंत लागू किया जा सकता है , प्रतीक्षा महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों के उद्देश्य को विफल करती है
बड़ा मुद्दा: 75 वर्षों में भी महिलाओं की भागीदारी बेहद कम भारत की संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अब भी 15% से कम है। याचिका में कहा गया: “जब लोकतंत्र समान प्रतिनिधित्व पर आधारित है, तो आधी आबादी को निर्णय प्रक्रिया से दूर रखना न्यायसंगत नहीं है।” अब मामला केंद्र के जवाब के बाद आगे सुना जाएगा।