भारतीय टेनिस जगत के धुरंधर रोहन बोपन्ना ने 1 नवंबर 2025 को एक भावुक घोषणा के साथ पेशेवर टेनिस से संन्यास ले लिया। 45 वर्षीय इस दिग्गज ने इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट शेयर कर दुनिया को बताया कि 22 वर्षों की अपनी यादगार यात्रा को अब अलविदा कहने का समय आ गया है। “यह एक विदाई है, लेकिन अंत नहीं। टेनिस ने मुझे खोए हुए समय में उद्देश्य दिया, जब सब कुछ अंधकारमय लग रहा था,” बोपन्ना ने लिखा। उनका अंतिम मैच पेरिस मास्टर्स 1000 में कजाकिस्तान के अलेक्जेंडर बुलबिक के साथ खेला गया, जहां वे ऑस्ट्रेलियाई जोड़ी जॉन पीयर्स और जेम्स ट्रेसी से हार गए।

यह खबर न केवल भारतीय टेनिस प्रेमियों के लिए दुखद है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी एक युग का अंत माना जा रहा है।रोहन बोपन्ना का जन्म 4 मार्च 1980 को कर्नाटक के कूर्ग (कोडागू) जिले में एक कॉफी बागान परिवार में हुआ। बचपन से ही टेनिस के प्रति उनका जुनून साफ झलकता था। लकड़ी काटकर अपनी सर्व क्षमता मजबूत करने और कॉफी बागानों में दौड़ लगाकर सहनशक्ति बढ़ाने वाले इस युवा ने 2002 में पेशेवर टेनिस में कदम रखा। शुरुआती वर्ष चुनौतियों भरे थे। चोटें, आर्थिक तंगी और अपेक्षाओं का बोझ—सब कुछ झेलते हुए उन्होंने कभी हार नहीं मानी। 2007 में पाकिस्तानी खिलाड़ी ऐसम-उल-हक कुरैशी के साथ उनकी जोड़ी ‘इंडो-पाक एक्सप्रेस’ के नाम से मशहूर हुई। यह साझेदारी न केवल कोर्ट पर सफल रही, बल्कि भारत-पाकिस्तान के बीच शांति का प्रतीक भी बनी। इस जोड़ी ने 2010 यूएस ओपन में क्वार्टरफाइनल और 2012 लंदन ओलंपिक में ब्रॉन्ज मेडल मैच तक पहुंचकर इतिहास रचा।बोपन्ना के करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि 2024 में आई, जब 43 वर्ष की उम्र में उन्होंने ऑस्ट्रेलियन ओपन में ऑस्ट्रेलियाई मैथ्यू एब्डेन के साथ मिलकर पुरुष युगल खिताब जीता। ओपन एरा में ग्रैंड स्लैम जीतने वाले सबसे बुजुर्ग खिलाड़ी बनकर उन्होंने रिकॉर्ड तोड़ दिया। इसके कुछ ही दिनों बाद वे डबल्स में विश्व नंबर-1 बने, जो फिर से उम्र के लिहाज से रिकॉर्ड था। 2017 फ्रेंच ओपन में हंगेरियन टाइमिया बाबोस के साथ मिक्स्ड डबल्स खिताब जीतकर उन्होंने दो ग्रैंड स्लैम ट्रॉफी अपने नाम कीं। वे भारत के उन चार खिलाड़ियों में शुमार हैं जिन्होंने ग्रैंड स्लैम जीता है—लीना भट्टाचार्य, सानिया मिर्जा और महेश भूपति के साथ। एटीपी टूर पर 25 से अधिक युगल खिताब जीतने वाले बोपन्ना ने 2012 और 2015 एटीपी फाइनल्स में फाइनल खेला।राष्ट्रीय स्तर पर भी उनका योगदान अतुलनीय है। डेविस कप में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्होंने 2023 में मोरक्को के खिलाफ अपना अंतिम मैच खेला। चार ओलंपिक (2008 बीजिंग, 2012 लंदन, 2016 रियो, 2024 पेरिस) में भाग लेने वाले वे पहले भारतीय टेनिस खिलाड़ी हैं। 2016 रियो ओलंपिक में सानिया मिर्जा के साथ मिक्स्ड डबल्स में चौथा स्थान हासिल किया, जो मेडल से महज एक कदम दूर था। उनकी सहनशक्ति और दृढ़ता ने युवा खिलाड़ियों को प्रेरित किया। चोटों से जूझते हुए भी उन्होंने कभी रुचि नहीं खोई। “हर बार जब मैं कोर्ट पर उतरा, तो यह मुझे दृढ़ता, लचीलापन और लड़ने की ताकत सिखाता रहा,” उन्होंने संन्यास घोषणा में कहा।संन्यास के बाद भी बोपन्ना टेनिस से दूर नहीं होंगे। उनकी रोहन बोपन्ना टेनिस अकादमी और यूटीआर प्रो टेनिस के साथ साझेदारी के जरिए वे भारत के उभरते सितारों को निखारते रहेंगे। परिवार को धन्यवाद देते हुए उन्होंने कहा कि पत्नी सुप्रिया और बेटे की प्रोत्साहन ने उन्हें संभाला। “यह अलविदा नहीं, धन्यवाद है,” उन्होंने प्रशंसकों से कहा।रोहन बोपन्ना का संन्यास भारतीय टेनिस के लिए एक क्षति तो है, लेकिन उनकी विरासत अमर रहेगी। दो दशकों में उन्होंने न केवल ट्रॉफियां जीतीं, बल्कि खेल को एक नई ऊंचाई दी। युवा पीढ़ी उनके संघर्ष से सीखेगी कि उम्र महज एक संख्या है। टेनिस प्रेमी उनके योगदान को हमेशा याद रखेंगे।