विश्वकप हाथ में पकड़े. ये चक दे इंडिया के ‘ कबीर सिंह ‘ नहीं, बल्कि इंडियन वुमन क्रिकेट टीम के हेड कोच अमोल मजूमदार हैं.
कभी-कभी, हमारी आंखों में पले सपने, दूसरे के हाथों पूरे होते हैं. वो सपना जो कभी हमारा था, वही सपना दूसरों को देखना सिखाया और केवल सिखाया ही नहीं, साकार भी करवाया. विश्वकप हाथ में पकड़े. ये चक दे इंडिया का ‘ कबीर सिंह ‘ नहीं, बल्कि इंडियन वुमन क्रिकेट टीम के पीछे खड़ा अमोल मजूमदार थे. साउथ अफ्रीका का अंतिम विकेट गिरते ही भारतीय शेरनियां जश्न मना रही थी और दूर खड़े अमोल मजूमदार की आंखों की चमक बढ़ती जा रही थी.
मजूमदार भले ही कभी नीली जर्सी नहीं पहन पाए, लेकिन नीली जर्सी वाली शेरनियों को उस खिताब तक पहुंचा दिया, जिसका सपना हर खिलाड़ी देख रहा होता है. अमोल मजूमदार की कहानी क्रिकेट के मैदान तक सीमित नहीं रही है, बल्कि उससे कहीं आगे की है. ये गाथा है, एक ऐसे खिलाड़ी की है, जिसने अपनी अधूरी कहानी को दूसरों के सपनों के साथ पूरा कर दिखाया.
साल था, 1988, जब 13 साल का एक लड़का, हैरिस शील्ड टूर्नामेंट में नेट्स के पास अपनी बल्लेबाजी की बारी का इंतजार कर रहा था. उसी मैच में उसके साथी सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली ने 664 रनों की ऐतिहासिक साझेदारी कर दिखाई.पारी खत्म हो गई, दिन खत्म हो गया, लेकिन अमोल की बारी नहीं आई.
वो इंतजार, जो उस दिन शुरू हुआ, उसकी जिंदगी में शनि की साढ़े साती ‘ बन गया. हर बार, बारी उनसे कुछ ही कदम दूर रह जाती. 1993 में जब उन्होंने बॉम्बे के लिए डेब्यू किया तो पहले ही मैच में 260 रन ठोक दिए. डेब्यू पारी में दुनिया का सबसे बड़ा स्कोर. सब बोले- ‘ यह अगला सचिन बनेगा.’ लेकिन भारतीय टीम में पहले से ही तेंदुलकर, द्रविड, गांगुली, लक्ष्मण जैसे सितारे थे. मजूमदार की चमक उनके बीच कहीं धुंधली पड़ गई.