ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय एथलीट तेजस्विन शंकर ने डेकाथलन में कांस्य पदक जीतकर एक बार फिर देश का नाम रोशन किया है। यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि तेजस्विन का सपना शुरुआत में एथलेटिक्स नहीं, बल्कि क्रिकेटर बनने का था। लेकिन किस्मत ने उन्हें ट्रैक एंड फील्ड की दुनिया में पहुंचाया और आज वे भारत के सबसे सफल बहु-प्रतिभाशाली एथलीटों में गिने जाते हैं।
बचपन में तेजस्विन स्कूल स्तर पर क्रिकेट खेलते थे। हालांकि, उनके कोच ने उनकी लंबाई और शारीरिक क्षमता को देखते हुए उन्हें एथलेटिक्स में हाथ आजमाने की सलाह दी। उन्होंने पहले हाई जंप और लंबी कूद में हिस्सा लिया, लेकिन बाद में अपनी बहुमुखी प्रतिभा के दम पर दुनिया की सबसे कठिन एथलेटिक्स स्पर्धाओं में से एक डेकाथलन को अपना करियर बनाया।
तेजस्विन के लिए यह सफर आसान नहीं रहा। करियर के दौरान उन्हें कई गंभीर चोटों का सामना करना पड़ा, लेकिन हर बार उन्होंने दमदार वापसी की। उन्होंने अमेरिका की कंसास स्टेट यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के साथ-साथ कड़ी ट्रेनिंग जारी रखी और शारीरिक व मानसिक दोनों स्तर पर खुद को मजबूत बनाया।
मूल रूप से हाई जंप विशेषज्ञ रहे तेजस्विन ने बाद में डेकाथलन में उतरने का फैसला किया। इस स्पर्धा में एथलीट को 100 मीटर दौड़, लंबी कूद, शॉट पुट, हाई जंप, 400 मीटर दौड़, 110 मीटर बाधा दौड़, डिस्कस थ्रो, पोल वॉल्ट, जैवलिन थ्रो और 1500 मीटर दौड़ जैसी 10 अलग-अलग प्रतियोगिताओं में लगातार दो दिनों तक प्रदर्शन करना होता है।
तेजस्विन ने इससे पहले बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 में हाई जंप में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचा था। यह इस स्पर्धा में भारत का पहला कॉमनवेल्थ पदक था। अब ग्लासगो 2026 में डेकाथलन में कांस्य जीतकर उन्होंने साबित कर दिया कि कठिन चुनौतियां ही बड़ी उपलब्धियों का रास्ता बनती हैं।
तेजस्विन की सफलता के पीछे उनके परिवार का भी बड़ा योगदान रहा है। चोट, असफलता और कठिन दौर में उनके माता-पिता ने हमेशा उनका हौसला बढ़ाया और आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।
क्रिकेटर बनने का सपना देखने वाले तेजस्विन शंकर आज भारत के सबसे प्रेरणादायक एथलीटों में शामिल हैं। उनका यह सफर बताता है कि अगर मेहनत, धैर्य और आत्मविश्वास हो तो राह बदल सकती है, लेकिन मंजिल नहीं।